10 साल की ख़ामोशी भरे शासन के बाद ज़ुबानी जंग का माहिर एक बेहतरीन वक्ता इस देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण के लिए तैयार ।
आशा और आकांक्षा से ओत-प्रोत भारतवासियों के चिन्तित मनोभाव में एक ज्योति प्रज्जवलित करने का अथक प्रयास ।
अब शुरू होता है एक नयी सदी के नए भारत वर्ष के भारत से रूबरू होने का, जिसमे हर ओर कुछ न कुछ बदलाव अथवा मरम्मत की ज़रूरत जान पड़ती है ।
देश की जनता आज तक निराशा और हताशा की शिकार नहीं हुइ | जबकि हर बार पार्टियों ने वादों के पुलिंदे तो ज़रूर दिखाए, किन्तु पूर्ण रूप से उनकी पराकाष्ठा पर उतरना मानो नामुमकिन था ।
फिर भी देश की जनता ने आज़ादी के पश्चात से ही अपने वोट के अधिकार को आज़माने की भरसक प्रयास किया किन्तु उसे अपने उस वोट के बदले अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वालों से भेंट करना अपाढ़ एवं असहज साबित होता रहा ।
इस बार भी कुछ इसी तरह नए समीकरणों को आज़माने का प्रयास किया गया है अब यह तो समय ही बताएगा इस बार क्या हाथ लगने वाला है ।
हम इस बार भी आशा मात्र कर सकते हैं । बाकी लोकतंत्र के 543 संसद के चुने नवनिर्वाचित सदस्यों पर छोड़ना ही एक मात्र विकल्प है कि वह अपने सेनापति के भाषणों को अपने चरित्र में किस प्रकार उतारेंगे । क्या वही ढीला, सुस्त रवैया या इस बार एक सशक्त दिखाई पड़ने वाले सेनापति के आदेशों का पालन वाकई ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा से करने में जुटेंगे ।
देखा जाये तो कुछ सांसद महोदय कांग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी के टिकट से जीत कर संसद भवन में पहुँचे हैं । उनके पुराने ढर्रे में परिवर्तन अथवा वही चॉल चलन, ये भी एक बड़ा मुद्दा होगा । हम बस आशा मात्र ही कर सकते हैं । बाकी तो अब नए निर्वाचित सदस्यों पर उनकी नई ज़िम्मेदारियों का बोझ उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए ।
Courtesy: हसनैन
आशा और आकांक्षा से ओत-प्रोत भारतवासियों के चिन्तित मनोभाव में एक ज्योति प्रज्जवलित करने का अथक प्रयास ।
अब शुरू होता है एक नयी सदी के नए भारत वर्ष के भारत से रूबरू होने का, जिसमे हर ओर कुछ न कुछ बदलाव अथवा मरम्मत की ज़रूरत जान पड़ती है ।
देश की जनता आज तक निराशा और हताशा की शिकार नहीं हुइ | जबकि हर बार पार्टियों ने वादों के पुलिंदे तो ज़रूर दिखाए, किन्तु पूर्ण रूप से उनकी पराकाष्ठा पर उतरना मानो नामुमकिन था ।
फिर भी देश की जनता ने आज़ादी के पश्चात से ही अपने वोट के अधिकार को आज़माने की भरसक प्रयास किया किन्तु उसे अपने उस वोट के बदले अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वालों से भेंट करना अपाढ़ एवं असहज साबित होता रहा ।
इस बार भी कुछ इसी तरह नए समीकरणों को आज़माने का प्रयास किया गया है अब यह तो समय ही बताएगा इस बार क्या हाथ लगने वाला है ।
हम इस बार भी आशा मात्र कर सकते हैं । बाकी लोकतंत्र के 543 संसद के चुने नवनिर्वाचित सदस्यों पर छोड़ना ही एक मात्र विकल्प है कि वह अपने सेनापति के भाषणों को अपने चरित्र में किस प्रकार उतारेंगे । क्या वही ढीला, सुस्त रवैया या इस बार एक सशक्त दिखाई पड़ने वाले सेनापति के आदेशों का पालन वाकई ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा से करने में जुटेंगे ।
देखा जाये तो कुछ सांसद महोदय कांग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी के टिकट से जीत कर संसद भवन में पहुँचे हैं । उनके पुराने ढर्रे में परिवर्तन अथवा वही चॉल चलन, ये भी एक बड़ा मुद्दा होगा । हम बस आशा मात्र ही कर सकते हैं । बाकी तो अब नए निर्वाचित सदस्यों पर उनकी नई ज़िम्मेदारियों का बोझ उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए ।
Courtesy: हसनैन