रविवार, 29 जून 2014

मोनू की याद में ..

He was young, simple, innocent and extra-ordinary human being, Now He is not with us. Rememberance and in the memory of Monu(My Friend's nephew), 23 Years old met an accident at Mejaroad(Allahabad) flyover came down around 25 feet and passed away..

Remembering and Trying to console myself by writing few lines...
प्राण पखेरू उड़ गए ।
मोती से स्वप्न बिखर गए ।
अब कोई उद्देश्य नहीं
जीवन में कुछ शेष नहीं । ।

            वह ही सबसे प्यारा था ।
            सबकी आँखों का तारा था ।
            सच्चा सुन्दर साधारण था ।
            हम सब का दुलारा था ।
अब कोई उद्देश्य नहीं
जीवन में कुछ शेष नहीं । ।
           
            कल मैं उससे मिलता था
            अब न उससे मिलना है
            न अब कुछ कहना है
            न ही कुछ अब सुनना है ।
अब कोई उद्देश्य नहीं
जीवन में कुछ शेष नहीं । ।
         
           जो देखे थे कल के सपने
            वो सब चकनाचूर हुए
            वो जीवन से दूर हुए
            हम सब बस मजबूर हुए ।
अब कोई उद्देश्य नहीं
जीवन में कुछ शेष नहीं । ।
    
          हमसे तो इसकी पीड़ा न पूछो
          है साहस तो मातृ पितृ से पूछो
          अब जीवन का क्या मोल रहेगा  
         बस मर मर के जीने का प्रयास रहेगा ।
अब कोई उद्देश्य नहीं
जीवन में कुछ शेष नहीं । ।
           स्वप्नों में भूले बिसरे आजाए
           बस इसकी ही आशा है
           कहाँ जाऊं किससे बोलूं और क्या पूछूं
           अब हर ओर पड़ी निराशा है ।
अब कोई उद्देश्य नहीं
जीवन में कुछ शेष नहीं । ।
Courtesy: हसनैन

मंगलवार, 20 मई 2014

नव आशा दीप प्रज्जवलित

10 साल की ख़ामोशी भरे शासन के बाद ज़ुबानी जंग का माहिर एक बेहतरीन वक्ता इस देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण के लिए तैयार ।
आशा और आकांक्षा से ओत-प्रोत भारतवासियों के चिन्तित मनोभाव में एक ज्योति प्रज्जवलित करने का अथक प्रयास ।
अब शुरू होता है एक नयी सदी के नए भारत वर्ष के भारत से रूबरू होने का, जिसमे हर ओर कुछ न कुछ बदलाव अथवा मरम्मत की ज़रूरत जान पड़ती है ।
देश की जनता आज तक निराशा और हताशा की शिकार नहीं हुइ | जबकि हर बार पार्टियों ने वादों के पुलिंदे तो ज़रूर दिखाए, किन्तु पूर्ण रूप से उनकी पराकाष्ठा पर उतरना मानो नामुमकिन था ।
फिर भी देश की जनता ने आज़ादी के पश्चात से ही अपने वोट के अधिकार को आज़माने की भरसक प्रयास किया किन्तु उसे अपने उस वोट के बदले अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वालों से भेंट करना अपाढ़ एवं असहज साबित होता रहा ।
इस बार भी कुछ इसी तरह नए समीकरणों को आज़माने का प्रयास किया गया है अब यह तो समय ही बताएगा इस बार क्या हाथ लगने वाला है ।
हम इस बार भी आशा मात्र कर सकते हैं । बाकी लोकतंत्र के 543 संसद के चुने नवनिर्वाचित सदस्यों पर छोड़ना ही एक मात्र विकल्प है कि वह अपने सेनापति के भाषणों को अपने चरित्र में किस प्रकार उतारेंगे । क्या वही ढीला, सुस्त रवैया या इस बार एक सशक्त दिखाई पड़ने वाले सेनापति के आदेशों का पालन वाकई ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा से करने में जुटेंगे ।
देखा जाये तो कुछ सांसद महोदय कांग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी के टिकट से जीत कर संसद भवन में पहुँचे हैं । उनके पुराने ढर्रे में परिवर्तन अथवा वही चॉल चलन, ये भी एक बड़ा मुद्दा होगा । हम बस आशा मात्र ही कर सकते हैं । बाकी तो अब नए निर्वाचित सदस्यों पर उनकी नई ज़िम्मेदारियों का बोझ उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए ।
Courtesy: हसनैन

मंगलवार, 13 मई 2014

http://www.ndtv.com/elections/article/election-2014/why-are-terrorists-from-one-community-bjp-leader-giriraj-singh-in-new-controversy-523953?pfrom=home-lateststories
विविधतावों से परिपूर्ण भारतवर्ष में किसी बड़ी पार्टी के नेता को इस तरह के व्यक्तव्य से बचना चाहिये । जिसे लोग इस देश के नेतृत्व के जिम्मेदारी सौपने के लिये आतुर हों । किसी एक कम्मुनिटी को बोलने से पहले हमें अपने आंतरिक नक्सलियों की गतिविधियों पर सोचना चाहिए । बात हिन्दू या मुसलमान की नहीं बल्कि उनके सोच, इंसानियत और परिवेश की है । नफरत फ़ैलाने वाले और इंसानियत के दुश्मन को किसी भी धर्म विशेष से जोड़ना किसी धर्म का अपमान करना मात्र है ।

इसके बल पर यदि कोई लोकप्रियता बटोरने की मंशा यदि रखता है तो वह भारतवर्ष के राजनैतिक पटल पर अपने अन्त क़ी शुरुआत कर चुका है ।  क्यूंकि राजनितिक कूटनीति को 21 वि. सदी का हिन्दु , मुस्लमान या अन्य कोई व्यक्ति भली भांति जान गया है । आज हर कोई अपने पेट के साथ साथ अपने हृयदय में प्रेम और सौहार्द को संजोने का भूखा है । ना कि नफरत और इस तरह के व्यक्तव्य का जो हर ओर द्वेष एवं नफरत फैला रहा हो

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

दुःखद रेलयात्रा

अक्सर रेलगाड़ियों में लूटपाट की घटना आए दिन समाचार पत्रों में मिल ही जाती है । इस बार यह घटना लालकिला एक्सप्रेस में अलीगढ के नजदीक घटित हुई । अहम बात ये कि इस बार का आक्रमण रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में देखने को मिला ।
ये वही रेलगाड़ी है जो मेरे गाँव के स्टेशन पर रूकती है । ये लगभग हर १-२ स्टेशन छोड़कर रूकती है । ये कोई सुपरफास्ट रेलगाड़ी नहीं कि लगातार २-३ घण्टे तक चलती रहे।
रही बात इसमें यात्रा करने वालों कि तो एक थोड़ा जागरूक व्यक्ति इसमें यात्रा करने से कतराता है । और मज़बूरी ही है तो क्या करेगा कोई । किन्तु मेरे लिए इसकी सुविधा ये है कि मुझे दिल्ली जाने के लिए यह मेरे गाँव के स्टेशन से ही मिल जाती है इसलिए किसी नज़दीक के बड़े स्टेशन पर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती ।

अब आता हूँ पिछले दिनों घटित हुई घटना पर, लूटपाट की इन घटनाओं को पढ़ कर देश की परिस्थितियों का एक दुःखद परिदृश्य सामने आता है ।
बात लूटपाट की नहीं बात है हमारे प्रशासन की लापरवाही और देश के मान्यवर नेतागणों की जो केवल चुनावी रंगमंच पर देश की समस्याओं को अपने चुनावी भाषणो और मेनिफेस्टो में जगह देते आ रहे है और यह आस्वश्त कराते फिर रहे हैं कि मानो सत्ता की चाभी हाथ लगी तो सभी मुद्दों को जड़ से उखाड़ फेकेंगे और हमारी सारी समस्याएं छू मंतर करने के बाद ही दम लेंगे । ऐसा आज़ादी के बाद से होता आ रहा है किन्तु कुछ बुनियादी समस्याओं का अवलोकन करें तो असल तस्वीर बहुत धुंधली ही नज़र आती रही है ।
लूटपाट की इन घटनाओं के दोनों पहलूवों को देखने की ज़रूरत है । जिसमे लुट के शिकार देश की गरीब जनता और वो भी गरीब जनता जो इसे अन्जाम देते हैं । 
यदि हम पहले पहलु की बात करें, इस बार यह लूटपाट की घटना देश के उस निम्न तपके के लोगों के साथ घटित हुई जिन्हे अपने क्षेत्र में कोई काम न मिलने के कारण बड़े शहरों का रास्ता देखना पड़ता है । देश की तमाम चलायी गयी राष्ट्रीय योजनाओं का इनसे कोई सरोकार नहीं या ये कहें उनसे इन्हे लाभ नहीं वरन इन्हे अपना घर परिवार छोड़ना पड़ता है । यह इंसान मानो गन्ने की लुगदी समान है जिसको निचोड़ने पर आप समझ सकते हैं क्या निकलेगा । कुछ रस तो उनमें से निकलने वाला नहीं लेकिन इन घटनाओं का जो मानसिक आघात उन लोगों पर होगा उसका अनुमान लगाना और उसके दूरगामी परिणाम हम और आप गणना करने योग्य नहीं है ।
अब आते हैं दूसरे पहलु पर जो लोग इस तरह की घटनाओं को अन्जाम देते हैं, इन लूट्पाटी लोगों की भी स्थिति  देखे तो ये भी लोग गरीबी के ही शिकार जान पड़ते है जो देश की बुनियादी ज़रूरते के न मिलने के कारण अपना रोष अपने ही तपके के लोगों पर उतारने की कोशिश करते हैं । ये भी भली भांति जानते हैं कि हम अपने से ऊँचे के साथ जोर से बोल नहीं सकते तो अपनी हेकड़ी कैसे दिखाएंगे तत्पश्चात ऐसे तुच्छ कृत्य के लिए मज़बूर है । चलो मज़बूरी भी है तो क्या यह रास्ता उन्हें सहज जान पड़ता है ।
यदि सहज जान पड़ता है तो हमारे प्रशासन की ज़िम्मेदारियों पर सवालिया निशान उठाना लाज़मी है । इसके बाद उन राजतन्त्रों पर भी ।

क्या नेतागणों का ध्यान इन छोटे मगर आहात करने वाले मुद्दों पर भी सोचने को मजबूर करता है ? मैं कहता हूँ इस तरह के कई मुद्दे हैं जिन पर ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है । लेकिन बड़ी पार्टियां बस बड़े मुद्दे पकड़ लेने मात्र से सोचते है कि बहुसंख्यक वोट पर हम अपनी पकड़ बना लेने से सत्ता की कुंजी तो हाथ लग ही जाएगी बाकी इतने बड़े देश में ऐसी छोटी मोटी घटनाएँ तो होती ही रहती हैं ।  ऐसा नेतागण सोचते हैं, अभी भले न सोच रहे हों क्योंकि यह उनके परीक्षा की घडी है अमूमन ऐसा ही होता आया है विगत आज़ादी के बाद से । या फिर अपने इस राजनितिक व्यापार के मुनाफे के लिए इन मुद्दों से उनके वोटों में अधिक बढ़ोत्तरी नहीं होने वाली है यह जानकर इस पर सोचने की कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं बनती है ।



शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

हुस्न और इश्क

इश्क में रोना गर इश्क ना हो ना |
इश्क में रोना गर हुस्न किसी और का होना |
इश्क में फिर भी रोना गर हुस्न मेरा होना |
यही दस्तूर है इश्क और हुस्न का मेरे हसनैन | |

नज़र नज़र का फेर है, उनकी इक नज़र गर इस तरफ गिर जाये
आम गर ख़ास न बन जाये, खुदा कसम नाम बदल लेंगे हसनैन मियां | |

हुस्न और इश्क के इस बाज़ार में हम न  बिक पायेगे |
और आप के पास इतनी कीमत भी नहीं हसनैन भाई | |

Courtesy: हसनैन |

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

चुनावी चेहरा

आज मोदी का जो चेहरा सामने आया है जिसका पूरा श्रेय कांग्रेस की नाकामियों और केजरीवाल को जाता है और कुछ नहीं है जो मोदी की लोकप्रियता को बढ़ा रहा है । इतने लोकप्रिय है मोदी जी तो रामपुर, मुरादाबाद या किसी अन्य अल्पसंख्यक होने के नाते अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्र से चुनाव लड़ें । अपने भाषण से उनको लुभा लें । क्यूंकि वो तो विकास पुरुष है अपना जादू चलायें ।  

हर राजनेता केवल जाति की दकियानूसी के आधार पर चुनाव लड़ रहा है जिसकी बुनियाद ही इन मुद्दों पे टिकी हो तो आप किस तरक्की की बात कर रहे है । हम सब स्वयं को चुनावी ज़ुबानी जंग और इस इलेक्शन के माहौल में अपने आप को ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार कर रहे हैं । बाकी कुछ और नहीं है मै इस बात से आपको आश्वश्त करता हूँ कि हम चुनाव के बाद इस शिद्दत से इस बहस में अपनी भूमिका नहीं निभाने वाले हैं ।

ये हमारे विचारों में द्वेष का इंजेक्शन भर रहे हैं जो आज हम एक दूसरे से अपनी भावना को व्यक्त कर रहे है । न मैं मोदी को समर्थन देने को तैयार हूँ आप कितनी ही दलीलें क्यों न पेश करें ।

आज हमारे वातावरण में ये काले बादल इन राजनितिक पार्टियों की वजह से छाये हुए हैं ये इन्हे छाँटने वाले नहीं अगर ये छँट गए तो हमें खुला आसमान जो मिल जायेगा ।

भाई शरीफ इंसान को आज के इस चुनावी जंग में जीतते हुए देखा है क्या ?

भाई ज़रा सोचिये ?
सोचिये:-
1) कहाँ से इन पार्टियों को इतने सारे पैसे मिल रहे है?
2) ये लोग 5000 करोड़ रुपये खर्च इस लिए कर रहे है की बदले में "जनता की सेवा" करेंगे या अपने खर्च का 4-5 गुना पैसा देश से लूटेंगे?
3) क्या ये कभी जनता की तरफ वफादार होंगे या उन मालिकों की तरफ जो इन्हें इतना सारा पैसा चुनाव लड़ने के लिए दे रहे है?
4) ये सारा पैसा ये कैसे कमाएंगे वापस? - हमारी और आप की जेब महंगाई से लूट कर और भ्रस्टाचार कर के.
5) क्यों नहीं बताते ये लोग की इन्हें इतना सारा पैसा कौन दे रहा है?
6) आप कितने mp को सरकार से बेदखल करोगे अगर सरकार बनती है ?

वाकई में ये सोचने की बात है बटन दबाने से पहले, जागो जनता जागो । ।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

इक तू ही आइना-ए-साज़

  
    इक बात पर आगाह क्या कर दिया
    अब बात बात पर हकलाते हैं ।
    कभी कभी तो कतराते हैं  । ।
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    किसी के पास कुछ न होने का ग़म तो
    किसी को उसे छुपाने का ग़म,
    उफ़ गम ही गम इस जहाँ में ऐ मौला । ।
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    मोहब्बत का हिस्सेदार और कौन है हमारे दरमियाँ
    चलो इक बार आज इसका फैसला हो जाये ।
    चलो इक बार फिर से उसके इस ज़ुर्रत की आज़माइश हो जाये । 
    न तीर से न तलवार से, आज मोहब्बत की जंग हालात से हो जाये ।
    चलो इक बार फिर से उसके मोहब्बत की जंग जज़्बात से हो जाये । ।
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    नज़र को तालीम ऐसी दी है हमने ।
    जिसको देखती है तारीफ बयान करती है  । ।
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    तौबा कर कर के गलती हर बार करते हैं ।
    इंसानी फितरत है ये कि कारनामा हर बार करते है । ।
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    ज़ात के इस खेल में लोग हो गए तार तार 
    और वो हैं के खुद को कहते है ज़ोरदार  । । 
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    आज इश्क़ की आज़माइश हो गयी
    दिलों में क्या था उसकी नुमाइश हो गयी ॥
    ज़िन्दगी एक और ग़म से आफ़ज़ाइश हो गयी   
    हमें तो बस दर्द-ए-दिल की ख्वाहिश हो गयी ॥
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     हर चीज़ का वक़्त मुकर्रर है मेरे दोस्त
    हाथ न मार पैरों को न चला । ।
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    आफ़रीं आब-ए-रवां, जहाँ हो गया आइना
    काबिल-ए-तारीफ इस जहाँ में, इक तू ही आइना-ए-साज़ । ।
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गुज़रा ज़माना

गुज़रे ज़माने कि तस्वीर धुंधली होने नहीं देता 
जब भी वक़्त मिला सफर ज़रूर करता हूँ । ।

हर ज़र्रे पे अपनी बसारत पेश करता हूँ
जो मिल जाये उसे सलाम ज़रूर करता हूँ  । । 

सफर के इस बसर में बंद-ओ-बस्त क्या करना
जो मिल जाये वही शुक्र-ए-ख़ुदा जरूर करता हूँ । ।

आइना साफ करते करते जब कभी भी थक गया
इक बार अपने अक्स को साफ़ ज़रूर करता हूँ । । 

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

ग़म-ए-दिल

उनकी नज़ाकत है एक उल्फत जिसकी खरीद फरोख्त तो खूब हुई,
ग़र हुस्न के किसी खरीदारों से ग़म-ए-दिल ख़रीदा न गया ।

सोमवार, 24 मार्च 2014

मुसाफिर

चल चला चल मुसाफिर अपनी राह पर
मंज़िल को तुझसे मिलना पड़ेगा ।
मंज़िल को कितना गुमान है
वो तो बस खड़ी इक मशाल है ।
रुकेगा तू नहीं थकेगा तू नहीं,
थमने की तू ज़हमत ना कर
चलना तो तेरी फितरत में है ।
रुक गया ग़र तू
रुक जायेगा ये सारा जहाँ ।
तू ना होगा तो मंज़िल की क्या मज़ाल है
तुझसे ही रोशन मंज़िल के तख़्त-ओ-ताज़ है ।

रविवार, 23 मार्च 2014

Happy Water's Day...


बिन पानी सब सून,
शरीर मे बहता बनकर मानो खून,
पानी है कुदरत का बून,
मन मे होगा अब ऐसा जुनून,
पानी बचाना है जरुर, 
इस बात की है अब मुझ पे धुन ।

Happy Water's Day...

जीवन है अनमोल,
बिन जल जीवन का क्या मोल ।
जल का हर बून्द है अनमोल,
इस बात से अब कर लो मेलजोल,
क्युकि बिन जल जीवन का क्या मोल ।

विरोधाभास-हर हर मोदी

कभी कभी अफ़सोस होता है तो लिखने बैठ जाता हूँ कि आज इस २१वीं सदी में प्रवेश किया हुवा भारत वर्ष का नागरिक उचित और अनुचित को भेद करने में असमर्थ हैं ।
हमें ये जानना अति आवश्यक है कि सत्य सदैव सत्य है और रहेगा, किन्तु असत्य कितनी ही कोशिश क्यूँ न करले वो सत्य नहीं हो सकता । सत्य की राह कभी कभी कठिन जरुर लगती है किन्तु उसका आनंद परमानन्द है, जो आनंद असत्य राह पर चलने वाला कभी नहीं चख सकता ।

अब आती है बात सत्य और असत्य में भेद करने की जो उससे भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, उसको अपने आचरण में उतारने की और उससे उपजे किसी भी सोच अथवा अभिव्यक्ति को व्यक्त करने की, इसमें भेद करते समय कई मानदंड हमारे उस विचार अथवा सोच में अहम् भूमिका का निर्वाहन करते हैं, अब हमें ये सोचना अति आवश्यक है कि हम इन नाना प्रकार के मानदंडों को किस प्रकार अपने दिल और दिमाग पर हावी होने देते हैं, मानदंड तो कई हैं किन्तु एक मानदंड पर ही मै सोचता हूँ जो हमारे ऊपर बड़ा आघात करता है, वो है कि हम किसी भी सत्यता अथवा असत्यता को न जानते हुए उसके बहाव में बह जाते हैं और नाना प्रकार की टिप्पणियाँ करने में लग जाते हैं ये वाकई में बहुत ही विचित्र है ।

इन्ही सब के बीच एक लोगों कि अभिव्यक्ति नारे के रूप में निकल कर आयी जो आज लोगों में खूब प्रचलित हो रहा है, जिस पर विवादों का ताण्डव धीरे धीरे मंडराना शुरू हो रहा है ।

जो नारा सुनने में आया है वह है 'हर हर मोदी, घर घर मोदी' जो अपने आप में ही पूरा का पूरा विरोधाभास है क्यूंकि उनकी स्वयं की पार्टी में कुछ लोग मोदी को स्वीकार करने में कोताही बरत रहे हैं और कुछ तो इस कारण इनसे अलग हो गए हैं, तो हम कैसे मान ले कि घर घर मोदी विराजमान हो गए हैं ।

किन्तु देश का कुछ एक तपका हर बात से बेखबर हो कर ऐसे नारे देने में लगा हुवा है जो सीधे सीधे अपने घरों से भगवान को ही विस्थापित कर रहा है, और महादेव की जगह मोदी विराजमान हो रहे हैं, क्या विडम्बना है हमारी। कुछ तो बुद्धि, विवेक का इस्तेमाल कर लो मित्रों ।

वो दिन अब दूर नही जब आने वाली पीढी 'हर हर महादेव' भूल 'हर हर मोदी' का जाप करेगा  ।

नारो का जोड तोड करिये किसी ने न ही रोका किन्तु कम से कम भगवान और इन्सान मे फ़र्क तो समझो लोगो, लहर के बहाव मे सम्भालो अपने आप को, कही ऐसा न हो ये सुनामी बन कर हमारे घरो को ही तबाह कर दे, अपनी स्वयं की शक्ति से बेखबर लोगों , अपनी शक्ति को पहचानो ।
एक बात हम सब को जान लेना चाहिए कि ये नेतागण तो एलेक्श्न मात्र तक है उस के बाद कोई झाँकने वाला नही, और दूसरी बात घरो मे सदैव महादेव ही रहने वाले है, ये तो बरसाती मेंढक मात्र है जो पाँच साल में एक बार इस चुनावी मौसम में टर्र टर्र करते हैं और उसके बाद क्या करते हैं हम सब से छुपा हुवा नहीं है । 

गुरुवार, 13 मार्च 2014

आम आदमी की व्यथा

आदरणीय आम आदमी,

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि ये २०१४ इलेक्शन अब बहुत नज़दीक है हर किसी को बड़ी सावधानी और सतर्कता से अपने बुद्धि विवेक के इस्तेमाल से अपनी शक्ति को जताने का एक बार फिर मौका मिला है क्या इस बार भी हमें कोई उल्लू बनाएगा ? क्या इस बार भी हम ठगे जायेंगे ? हर किसी के मन में यही ख्याल आता है नहीं इस बार नहीं , नहीं इस बार तो ऐसा नहीं होना चाहिए । इस बार जो आएगा वो हमारे खोये हुए सम्मान व हर मुरझाये हुए चेहरे को अपने कारनामे से खुश कर देगा ये तो समय बतायेगा । अभी से कुछ भी कहना नाइंसाफी ही होगी । 

इस बार एक और नयी पार्टी 'आप',  इस २०१४ के इलेक्शन को इसने बहुत ही रोचक बना दिया है इस बात का आभास बीजेपी को भी हो रहा है कि ये बिना बात रोड़ा बनकर बीच में आगया वरना मौका इतना बेहतरीन था कि इसको वन-डे क्रिकेट मैच की भांति जीत जाते वो भी बोनस प्वाइन्ट के साथ, किन्तु, समीकरण ख़राब भी हो सकता है, ये तो अब हमारी सीटों में सेंध भी लगा सकता है, जितनी सीटें 'आप' के पक्ष में जाएँगी उतनी दूरी मोदी की कुर्सी को दिल्ली से गुजरात की ओर सरकाएगी। इसलिए कोई गलती न हो इसका भी ख्याल बखूबी रखा जा रहा है , कांग्रेस की पिछली लापरवाहियों का भी इन्हे ख्याल है जो बीजेपी को अपने इस प्रतिद्वंदी को कम नहीं आंकने दे रहा हैं, ये भी अच्छी बात है यदि कोई खिलाडी मैदान में उतरा है तो उसमे कुछ तो हिम्मत है, और ताज़ातरीन दिल्ली के इलेक्शन की याद भी दिल में सजी हुयी है जो भुलाये नहीं भूलती ।

और इस रोचक मुक़ाबले की ज़रूरत भी आन पड़ी थी, क्यूंकि आज जिस मुहाने पर हमारा देश जा पहुंचा है वह विषय निश्चितरूप से विचारणीय है आज हर कोई अपने भीतर के केजरीवाल को जगा रहा है कि अब बहुत देर हो चुकी है, अब तक हमारे देश का आम आदमी मौजूदा पार्टियों पर भरोसा जताते हुए इस देश में राजनितिक गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा और देता रहा, महज़ ये सोच कर की चलो आज नहीं तो कल कुछ बदल जायेगा लेकिन ये तो वाकई में 'कल' बन गया जो कभी आता ही नहीं। जो वाकई चिंता का विषय है कि राजनीती में आम आदमी की भागीदारी नगण्य मात्र एवं नेता और आम आदमी के बीच टूटता नाता, आज पार्टियों का ध्रवीकरण मात्र पैसे वाले लोगों की ओर है न कि आम आदमी पर, टिकटों के बंटवारे में वो ही अहम् भूमिका निभाते हैं, आम आदमी तो उसके सामने बेचारा बन गया है ।
नेता से उनकी दुरी निश्चितरूप से चिंताजनक है आलम ये है के यदि कोई नेता आम आदमी के अपने शहर में भी आजाये तो उसे १०० मीटर की दुरी बनाना अनिवार्य हो गया है , नेता और आम आदमी का नाता टूट चूका है, हर इंसान राजनीती से विवश जान उसके सामने केवल अपने वोटरूपी शक्ति देने के बाद ५ साल तक निहत्था होकर बैठना ही एक चारा मात्र रह गया है  उस वोट के बदले अपने विकास को पूछने का मौका ही कब इन नेतावों ने उन आम आदमी को दिया जिसके वोट से आज ये यहाँ आये हैं,  अब इनसे आम आदमी से कोई सरोकार नहीं, आम आदमी के १ -१ वोट ने इनको इतनी शक्ति प्रदान कर दी कि अब तो इनका इस्टेट्स ही बदल गया अब क्या इन्हे चाहिए जो ये उस नगर या गावों में जाएँ, जहाँ से जीत कर आये हैं और हाँ ये भी है के यदि जिसे कनॉट प्लेस में वहाँ, पान खाने को मिल रहा है जहाँ जवाहर और लालू पान खाते थे तो कोई अपने शहर के चौरसिया जी का पान क्यूँ खायेगा।  अब तो उनका दिल दिल्ली में ही लगता है । हमारे देश के  आम आदमी के लिए अब तो बराक ओबामा से मिलना आसान किन्तु उन्हीं के क्षेत्र सांसद महोदय से मिलना अपाढ़ हो गया है ये जो अंतर, बहुत बड़ा हो गया है जिसकी अति हो गयी है और हम सभी जानते हैं कि अति का अंत निश्चित है|

किन्तु एक बात का तो आभास मुझे व्यक्तिगत रूप से हो रहा है कि इस इलेक्शन में कांग्रेस का सफाया और बहोत हद तक बीजेपी पर गति अवरोधक का काम 'आप' करने वाली है, जो हर नेता के माथे पे सिकन का सबब बन रही है। 

देश में मौजूदा पार्टियों की दशा और दिशा से लोगों का विश्वास बहुत हद तक उठ चूका है जो कि निश्चितरूप से इन पार्टियों पर सवालात करने के लिए हर किसी को मजबुर कर रहा है , देश की जनता को इन लोगों ने इस कदर मजबूर कर दिया के अब कोई आम आदमी में इतनी हिम्मत न है जो इनके समक्ष खड़ा हो पाये, हर किसी में बेचैनी तो ज़रूर थी किन्तु उसका उपाय सुझाये सूझ नहीं रहा था, इसी बीच राजधानी दिल्ली में आंदोलनो का दौर चला और लोगों के आक्रोश की एकजुटता हर भारत के नागरिक में दिखी जिनमे वाकई उस पीड़ा को देखा जा सकता था जो पिछले कुछ वर्षों में यहाँ कि जनता ने महसूस किया और उसके माहौल में अपने आपको जीने के लिए तैयार कर लिया था क्यूंकि सभी जानते हैं कि तंत्र से लड़ना कोई आसान काम नहीं , यह मौका अच्छा था इसलिए हर एक तपका इस आंदोलन में खुलकर अपनी भागीदारी को सिध्द करने कि प्रतिज्ञा लेकर उतरा,  वह इंसान भी सम्मिलित हुवा जो राजनीती को हमेशा गंदे लोगों का कृत्य मानता था क्यूंकि अब ज़रुरत जान पड़ी थी और ये भी जान गए कि अभी नहीं तो कभी नहीं इसीलिए आम आदमी ने अपनी मांग के ज़रिये अपने बल को भुनाने की ठानी इस बात से कांग्रेस पार्टी भी बेख़ौफ़ थी कि उसे इस आंदोलन के सफल होने कि आशंका इतनी न थी कि इनकी दिल्ली की सत्ता को ही उखाड़ फेकेगी।

ये माहौल ऐसा गरमाया जिसमे आम आदमी को एक बार २१वि सदी में इस तरह के आउटडेटेड कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मिला जिसने आंदोलनों को कई मोड़ दिखाए और अन्ततः देश को के एक आम आदमी ने इन मौजूदा नेतावों से इनके पिछले कारनामों का हिसाब लेने के लिए अपने आप को तैयार करने में कोताही नहीं समझी और देश को एक नयी पार्टी देने का निर्णय लिया, इस निर्णय ने कुछ को जोड़ा तो दूसरी तरफ कुछ लोगों को तोडा।

और इन्ही सब के बीच एक नयी पार्टी का उदय, जिन्होंने व्यवहारिक समस्याओं को देश के पटल पर रखते हुए केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी के बीच में उतारा जिसे निश्चितरूप से जनता को स्वीकार्य एवं उनकी भागीदारी को बल प्रदान करता है, क्यूंकि पहली बार आम आदमी ने जातिवाद, असामनता तथा अन्य कई बुराइयों को कोई जगह न देते हुए बल्कि देश में व्याप्त समस्याओं जो एक आम आदमी की निजी ज़िन्दगी में रोज़ उनसे सामना कराती है  इसने उन समस्याओं को बुनियादी तौर पर इनके हल ईमानदारी से जन जन तक पहुँचाने का प्रयत्न करने का वादा किया है, येही मुहिम इसे हर एक पार्टी से भिन्न करती है, इसने अपने आग़ाज़ से ही अन्य पार्टियों को बहुत हद तक चौकन्ना कर दिया है हमें इस उपलब्धि को कम नहीं आंकना चाहिए |
हर पार्टी कहती है हम इनसे कुछ नहीं सीखते ये तो स्वयं ही भ्रष्ट हैं किन्तु अंदर ही अंदर जो इस राजनीती का मज़ा आगे के लिए चखना चाहता है उसने अपने स्वाभाव में बहुत हद तक तबदीली लाने का मन बनाया है ।

हमारे चारों ओर ऐसी पार्टियां हैं जिनके बारे में हम चित परिचित हैं, कोई किसी से कम नहीं जब जब जिसको हमने मौका दिया उसने हमें धोखा दिया और हमारे विश्वास को तोडा है । मैं मानता हूँ कि कांग्रेस कि नाकामियों ने दूसरी बड़ी पार्टी बीजेपी को बाई डिफ़ॉल्ट प्रबल दावेदार के रूप में खड़ा कर दिया है, जो कि बाई डिफ़ॉल्ट है, किन्तु इस पार्टी के कारनामों से हम सब अवगत है, और एक नए चेहरे के चुनावी भाषण ने लोगों में हुंकार भर दिया है किन्तु इस बात को हमें समझ लेना चाहिए कि ये सब खोखले सपने दिखाने में माहिर हैं अपनी ब्रांडिंग कैसे करनी है उसके लिए भी इन्होने खूब लोगों की जेबें टटोलीं हैं अपने इस लहर के कहर से एक बार फिर आम आदमी पर हावी होने कि कोशिश हुयी है, क्या आम आदमी फिर से इन्ही लहरों के वेग में बह जायेगा या अपने पुरे आत्मविश्वाश के साथ सोचा समझा निर्णय ले पायेगा ?

ऐसा नहीं कि आज ये पार्टियां पूरी तरह से अपना स्वरुप बदलने को तैयार है, आज भी ये पार्टियां आम आदमी को बाँट उनके वोट बैंक पर अपना ध्यान केंद्रित करती है, इस वोट बैंक के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं ये किसी भी तरह का ज़हर घोलने से बाज़ नहीं आते, सारे नए पुराने किस्से हमें मालूम है अब हमारी बारी है, और फैसला हमारा होगा कि हमें किस ओर करवट लेनी चाहिए ।

अब एक सन्देश जो देश के हर जन जन तक पहुँचाना चाहता हूँ जो मेरा नहीं बल्कि आम आदमी का आम आदमी के लिए ही है जिसका हनन आज तक होता आया है किन्तु इस बार ऐसा न होने दें |
आम आदमी के इस फैसले से हम देश नहीं बल्कि सोच बदलने जा रहे हैं १ सोच जो जीवन में नयी उमंग और तरंग ला सकती है, क्या इस बार सत्ता में काबिज सरकार हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगी, ये तो निश्चितरूप से समय बतायेगा ।

अब हम पर यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गयी है और इनको सबक सीखने का मौका भी, यदि आम आदमी अपनी शक्ति को प्रदर्शित करना चाहता है और अपना खोया हुवा नाता वापस लाना चाहता है तो इस बार क्या हमारी कोई रणनीति है या इस बार भी हम हर बार की भांति फिर से ठग लिए जायेंगे, देखते हैं, अब तो हम सब को चुनाव तक इंतज़ार और फिर सत्ता में आयी सरकार के सरोकार से ही मालूम पड़ेगा कि इस बार आम आदमी के हाथ क्या लगा है । या फिर से वही पुराना ढर्रा ।

सधन्यवाद !!!!

बुधवार, 5 मार्च 2014

चुनावी रंग में फेसबुक समर्थक और जनता!!!

चुनावी मौसम में रंग बदलता फेसबुक, हर कोई मानो अपने दोस्तों की दोस्ती को भूल कर इन बहुरुपिया नेतावों के चंगुल में फँस गया हो, बस लोग बाग़ केवल चुनावी पेज़ शेयर, लाइक और कमेंट फूंकने में लगे हुए है, अब किसी को यारों की यारी सूझ नहीं पड़ती, अपनी फोटो सभी भूल बैठे हैं, हर कोई मोदी और केजरीवाल के रंग में रंगा नज़र आ रहा है मानो हर एक समर्थक को वोट बटोरने का ठेका दे दिया गया है कि जो जितना शेयर और लाइक करेगा मानो नेता जी के पक्ष में उतना ही वोट गिरेगा या ये कहें कि ये भी एक पैमाना जान पड़ता है कि इस बार किसकी सरकार बनने वाली है, अगर पूर्ण रूप से इसको ही पैमाना मान लिया जाये तो 'तीसरा मोर्चा' एक कोने में दुपका हुवा भी नज़र नहीं आता है।
अब बात करते हैं इन समर्थकों कि जो बहुत ही उत्साहित हैं आजकल, मैं तो इन समर्थकों को तीन भागों में बाँट कर देख रहा हूँ, जिसमे तीन तरह के समर्थक जान पड़ते हैं, एक तो वो बस किसी के शेयर में हामी वाली मुंडी हिला कर लाइक करके कट ले रहे हैं, वो अपनी अभिव्यक्ति किसी को प्रदर्शित नहीं करना चाह रहे हैं कि वो किस तरफ करवट लेंगे।
दूसरे प्रकार के समर्थक जो शेयर किये हुए तस्वीर की तारीफ़ में कुछ कुछ कमेंट देने से नहीं चूक रहे है मानो शेयर करने वाले की हौसला आफ़ज़ाई करने की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने ही ले रखी है, और अपने साथी की इस कोशिश को बल देने में लगे हुए हैं । एक केजरीवाल की तारीफ में कुछ कमेंट लिख रहा है तो दूसरा उसका कटाक्ष और फिर पहले वाला अपनी बात की पुष्टि कर रहा है, और यदि इनमे से असमर्थ है तो उसी कमेंट को लाइक कर फिर सेकटने में देरी नहीं लगा रहा है, ये तो रहा कमेंट वाला समर्थक । 
और अब बारी आती है अंतिम प्रकार के समर्थक की जो उसको शेयर करने में चूक ही नहीं रहे हैं वो अपने आप को सबसे बड़े समर्थक के रूप में देख रहे हैं, उन्हें इस बात से कत्तई लेना देना नहीं कि शेयर की हुयी तस्वीर में कितनी सच्चाई है बस वो तो उसको आगे दूसरों के लिए परोस दे रहे हैं कि कितना ज्यादा ज्यादा लोगों तक पहुँच जाये उसके प्रभाव अथवा दुष्प्रभाव से उनका कोई वास्ता ही नहीं। 
क्या आप सब लोगों को नहीं लगता कि ये सोशल नेटवर्किंग की मूलभूत परिभाषा को ही बदलने का काम कर रहा है, मेरा मत तो ये है की सोशल नेटवर्किंग का उद्देश्य है कि १ दूसरे का सहयोग, दोस्ती, प्रेम और १ दूसरे से जुड़े रहने कि प्रेरणा का सन्देश देना न कि द्वेष और दूरी को बढ़ाया जाना , किन्तु इस राजनीतिक माहौल ने तो यहाँ इस सोशल नेटवर्किंग के पटल को भी दूषित करने का जैसे जिम्मा ही ले लिया हो ।
किन्तु कोई चिंता की बात नहीं ये तो बस एक चुनावी बादल हैं जो ज्यादा दिन तक टिकने वाले नहीं है, अभी हमारे दिल-ओ-दिमाग पर छाए हुए हैं ये तो बस चुनाव मात्र तक ही सीमित हैं जल्द ही सारे बादल छँट जायेंगे और हम वापस फिर से उसी ज़िन्दगी की जद्दोजहद में अपने आपको समेट अपने रोज़मर्रा के काम पर लग जायेंगे, अभी भी लगे हुए हैं किन्तु दिमागी कसरत इस ओर हो रही है माहौल ही कुछ ऐसा है । ऐसा नहीं की नेता इस बात से इत्तेफ़ाक़  नहीं रखते हैं कि ५ साल तो खूब मौज और मस्ती कर लिए हैं अब थोड़ा क़यूस्चन बैंक भी देख लो क्या पता कुछ इसी में से फस जाये बाकी इन्हे ये भी पता है की कापी जाँचने वाले को खुद ही कुछ नहीं आता तो हमको फेल कौन करेगा ।
कांपी जांचने वाला कोई नहीं बल्कि हम जनता ही हैं जो इन्हे पास और फेल करते हैं हम सब तो आशावादी हैं इसीलिए तो कभी अन्ना को गाँधी, केजरीवाल में शिव का रूप जो हर विष को पी लेगा और मोदी को मसीहा जो अपने आचार विचार से सब लोगों में जोश भर देगा और स्वावलम्बन परोस देगा, किन्तु हम सब को ये जान लेना चाहिए की इस मिलावटी ज़माने में इन सब लोगों से उम्मीद लगाना महज़ अपने आप को संतोष देने के बराबर है । यदि हम अपना उत्थान व विकास चाहते हैं तो वह हमारी स्वयं कि मेहनत और लगन से मिलने वाला है, इन लोगों के खोखले आश्वासन से तो बस इंतज़ार करते रहो अगर कुछ हो जाये तो बल्ले बल्ले  नहीं तो थल्ले थल्ले तो हैं ही ।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

जातिगत सियासी घमासान

एक कहावत हमारे समाज में बहोत ही मशहूर है कि
"जाति जो कभी नहीं जाती।
यद्यपि वो तो मौत के बाद भी नहीं जाती "
इस सियासी घमासान में कोई पीछे हटता प्रतीत नहीं हो रहा तो आखिर सबसे प्रबल प्रत्याशी इस मौके को क्यूँ न भुनाए, मै बात कर रहा हूँ मोदी जी की , वो भी इसमें पीछे नहीं हट रहे क्यूंकि सियासी राजनीती में तो उनकी भी अच्छी पकड़ रही है, हर क्षेत्र को एक  ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता है उन्हें इस बात कि भी अनुमान है, अतः उत्तरी भारत कि राजनीती में इन्होने अल्पसंख्यकों पे सियासी वर्जिस कि ही है तो क्या बुरा है क्यूंकि उत्तर भारत में आज भी काफी हद तक जाति की संख्या के आधार पर ही टिकट का बंटवारा होता है, उदाहरणतयः यदि कोई क्षेत्र ब्राह्मण बाहुल्य है तो उस क्षेत्र में ब्राह्मण प्रत्याशी ही होगा चाहे वो सपा,बसपा,कांग्रेस या भाजपा से हो। मैं दिल्ली की नहीं अन्य उत्तर भारत कि बात कर रहा हूँ।

यूँ, रही बात मोदी जी कि तो ये चुनौती बड़े ही शिद्दत और कश्मकश से मोदी जी को मिली है जिसे वो गँवाना नहीं चाह्ते हैं।  किसी तरह का भी तंत्र जो उनके काम आजाये वो छोड़ने वाले नहीं है क्यूंकि उन्हें पता है कि इससे अच्छा मौका फिर दोबारा मिलने वाला नहीं है इसलिए कोई कसर न रहे उसका पूरा इंतेज़ाम करने में जुटे हुए हैं क्यूंकि ये मौका गया तो मोदी जी के भी अरमान अडवाणी जी कि तरह ही बन कर रह जायेंगे। उन्हें इस बात का भी आभास है कि सारी परिस्थितियां मेरे लिए ही अनुकूल बनी हुयी है कहीं ये मौका यदि अगले पाँच वर्ष के लिए टला तो समझ लीजिये सपना, सपना ही बन कर रह जायेगा, कारण सिर्फ और सिर्फ दो ही है जो मोदी जी को इस बार थोडा साँस लेने पे मज़बूर कर रहा है, पहला तो ये कि कोंग्रेस का उनके सम्मुख छोटा हुवा कद और आम आदमी पार्टी का अन्य राज्यों कि सीमाओ तक न फैलना, किन्तु आने वाले पाँच वर्षो में तस्वीर बहोत हद तक बदलने वाली है।

अर्श से हो रही बरसात !!!

आसार तो बन रहे थे अर्श में कुछ यूँ ही
अहकाम तो खुदा ने भी भेज दिए कुछ यूँ  ही
अर्श भी कुछ हो रहे थे अफ़रोज़ कुछ यूँ ही
पहलु में आरहे बादल भी कुछ यूँ ही
बादलों ने हवावों से गुफ्तगू कर कुछ ली यूँ ही
अक्स भी मुझको लग रहे सितारे कुछ यूँ ही
आलम कुछ खुशनुमा बन रहा इस ओर कुछ यूँ ही।

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

क्या जाने

"जिन्हे मेरी खबर न हो वो मेरे दिल का राज़ क्या जाने
जो रोशनी से हो महरूम वो आफ़ताब क्या जाने
जो हो मोहब्बत के नशे में चुर वो बेवफाई क्या जाने
ज़िन्दगी जीने वाले चैन और सुकून क्या जाने
जिनकी खुद खुदा से हो गुफ्तगू वो मेरी बात क्यूँ माने
जिनके दिल कि बात खुद खुदा जाने वो आरज़ू क्या जाने
जिन्हे मेरी खबर न हो वो मेरे दिल का राज़ क्या जाने "

नेता जी की जय हो!

आज एक नेता जी का इन्टरव्यू सुना जिन्होंने कल यु पी विधान सभा के अंदर अपना कुर्ता उतार दिया और एक महानुभाव ने तो कुर्ता सहित अपनी गंजी को भी नहीं छोड़ा खैर ये सब छोड़िये मुद्दे कि बात पर आते है, कल उनसे एक पत्रकार ने प्रश्न पूछा कि फिल्मों में ये काम तो सलमान खान भी खूब करते हैं, नेता ने पट से जवाब दिया अरे क्या वो नचनियों की बात करते हो, कहते ही आग बबूला हो गया और कहता है आप हमारी तुलना उस नचनिये से करते हो। मेरा मन तो कहता,
 कि ये नेता जी वही होंगे जो अभी सैफई महोत्सव में आये हुए सलमान खान के साथ एक फोटू के लिए तरस रहे होंगे। और घर जाने पर इनकी बेगम और बच्चों ने भी खूब कोसा होगा कि,  हटो तुम एक फोटू तो निकलवा नहीं पाये सलमान खान के साथ इतना बढियां मौका था और बनते हो अपने आप को बहोत बड़े नेता नपोरी।  फिर यही नेता ने ये बात कहते हुए अपना पीछा छुड़ाया होगा कि अरे समझती नहीं हो वो अखिलेश और नेता जी(मुलायम सिंह) के साथ थे कहाँ हमारा नंबर आता और वैसे भी इन्टरनेसनल आदमी है सलमान खान।
और आज देखिये मौके कि नज़ाकत और अपने शर्मशार किये हुवे काम को किस अंदाज़ में अपनी हेकड़ी को दिखने कि कोशिश कर रहे हैं और अपना पाला बदल कर कहते हैं हमारी तुलना उससे मत करो सही बात है , तुलना कहाँ हो सकती है कहाँ एक खूबसूरत और हुनर से लबरेज़ इस देश का नायक और कहाँ तुम ठहरे देश के नालायक।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

आग़ाज़ एक ऐसा भी !

अभी तक हमारे देश के चंद नुमाइंदों ने चुनिंदा लोगों (आईएएस और भी काबिल लोग) को सिर्फ और सिर्फ किसी लोभ अथवा ऐसे पद जिसमे किसी तरह कि निर्णयात्मक कार्य कि गुंजाईश ही न हो, ऐसे लोगों को चुना किन्तु अरविन्द केजरिवल ने ऐसे पदों को दरकिनार कर जो बीड़ा उठाया वो अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि उस हर एक  भारत वर्ष के नागरिक के लिए जिसने अपने हृदय में १ ज्योति जला रखी है कि कुछ तो बदलेगा इस देश में. निश्चितरूप से इससे बेहतर विकल्प और आदर्श आज तक देश को किसी ने नहीं दिया ।
 मैं सभी भारत वर्ष के लोगों से आग्रह करता हूँ कृपया इस देश में बहती हुयी धनात्मक लहर को कम न होने दो, आज चाहे वो जिस किसी पार्टी से सम्बंधित हो उसे कम से कम आलोचना न करके इनके इस पहलकदमी का गर्मजोश से स्वागत करना चाहिए।