शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

इक तू ही आइना-ए-साज़

  
    इक बात पर आगाह क्या कर दिया
    अब बात बात पर हकलाते हैं ।
    कभी कभी तो कतराते हैं  । ।
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    किसी के पास कुछ न होने का ग़म तो
    किसी को उसे छुपाने का ग़म,
    उफ़ गम ही गम इस जहाँ में ऐ मौला । ।
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    मोहब्बत का हिस्सेदार और कौन है हमारे दरमियाँ
    चलो इक बार आज इसका फैसला हो जाये ।
    चलो इक बार फिर से उसके इस ज़ुर्रत की आज़माइश हो जाये । 
    न तीर से न तलवार से, आज मोहब्बत की जंग हालात से हो जाये ।
    चलो इक बार फिर से उसके मोहब्बत की जंग जज़्बात से हो जाये । ।
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    नज़र को तालीम ऐसी दी है हमने ।
    जिसको देखती है तारीफ बयान करती है  । ।
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    तौबा कर कर के गलती हर बार करते हैं ।
    इंसानी फितरत है ये कि कारनामा हर बार करते है । ।
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    ज़ात के इस खेल में लोग हो गए तार तार 
    और वो हैं के खुद को कहते है ज़ोरदार  । । 
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    आज इश्क़ की आज़माइश हो गयी
    दिलों में क्या था उसकी नुमाइश हो गयी ॥
    ज़िन्दगी एक और ग़म से आफ़ज़ाइश हो गयी   
    हमें तो बस दर्द-ए-दिल की ख्वाहिश हो गयी ॥
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     हर चीज़ का वक़्त मुकर्रर है मेरे दोस्त
    हाथ न मार पैरों को न चला । ।
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    आफ़रीं आब-ए-रवां, जहाँ हो गया आइना
    काबिल-ए-तारीफ इस जहाँ में, इक तू ही आइना-ए-साज़ । ।
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