दिल उसका भी धड़कता है | दिल उसके सीने में भी है | मगर दिल के साथ साथ ज़िंदगी में और भी रिश्ते हैं, नाते हैं, रवायते हैं और सच कहो तो अपने तौर तरीके और वसूल भी हैं जिनसे वह घिरा हुआ है |
दिल की हर वक़्त तो नहीं सुन सकता दिमाग़ भी तो है जो दूरगामी परिणामों के संकेत देता है | वह तो उसकी भी सुनता है |
हमारा समाज आज भी छोटे कस्बों और गाँव में ही बसता है | जो अपने घर की चार दीवारी को तो लाँघ लेता है मगर उसके गाँव की परिधि उसे मज़बूर कर बाँध लेती है | उसे बाँध लेता है एक ऐसे बंधन में जिससे वह आज भी बँधा हुवा है | वह आज़ाद तो हो गया मगर अपने घर की चार दीवारी और ज़रा आगे बढ़ा तो चबूतरे और अपने कस्बे और गाँव रूपी बंधन में बँध गया | दिल कचोट के रह गया मगर उससे भी कहीं ज़रूरी बात उसको लगती है वह है उसका अपना घेरा जिसे वह नहीं तोड़ सकता |
दिल उसका भी होता है मेले में घूमने का और अपने साथी को घुमाने का मगर वह घेरा फान्दने में ना जाने क्यूँ डरता है | शायद उसे खुद पर भरोसा कम है या ज़माने के घेरे में घिर गया है |
कभी दवाई दिलाने के बहाने वह मौके तलाशता है तो कभी मंदिर या मज़ार पर अपने करीबी की सलामती के मन्नत उतारने के बहाने | दिल तो धड़कता है मगर मज़बूर है क्यूंकी वह मज़दूर है | जो थक के चूर है मगर बस ज़माने के घेरे से मज़बूर है | मन उसका भी होता है लेकर उड़ जाए उसे एक ओर से दूसरे छोर पर मगर पीछे ज़माने और परिवार का घेरा उसे रोक लेता है |
कभी बच्चों के बहाने अपने बचपन को बुलाता है तो कभी उन्हीं के बहाने बच्चा बन धूम मचाता है |
बच्चों के तमाम इच्छाओं के बावज़ूद हिम्मत करता है वह मेले में जाने का | वह भी बहाना ढूंढता है अपने खोए बचपन को ढूँढने का |
उसने फ़िज़ूल की फ़िक्र में अपनका बचपन जोड़ने की बजाय घटा दिया अब उस घटे बचपन में अपने बच्चों के हिस्से के बचपन को जोड़ना चाहता है मगर अब फ़िक्र नही करता है |
घर में उसे कोसा जाता है | उसके खर्च को फ़िज़ूलखर्ची समझा जाता है |
पेट काट कर जीना अगर बचत है तो ये फ़िज़ूलखर्ची मेरे पेट की खपत है |
दिल की हर वक़्त तो नहीं सुन सकता दिमाग़ भी तो है जो दूरगामी परिणामों के संकेत देता है | वह तो उसकी भी सुनता है |
हमारा समाज आज भी छोटे कस्बों और गाँव में ही बसता है | जो अपने घर की चार दीवारी को तो लाँघ लेता है मगर उसके गाँव की परिधि उसे मज़बूर कर बाँध लेती है | उसे बाँध लेता है एक ऐसे बंधन में जिससे वह आज भी बँधा हुवा है | वह आज़ाद तो हो गया मगर अपने घर की चार दीवारी और ज़रा आगे बढ़ा तो चबूतरे और अपने कस्बे और गाँव रूपी बंधन में बँध गया | दिल कचोट के रह गया मगर उससे भी कहीं ज़रूरी बात उसको लगती है वह है उसका अपना घेरा जिसे वह नहीं तोड़ सकता |
दिल उसका भी होता है मेले में घूमने का और अपने साथी को घुमाने का मगर वह घेरा फान्दने में ना जाने क्यूँ डरता है | शायद उसे खुद पर भरोसा कम है या ज़माने के घेरे में घिर गया है |
कभी दवाई दिलाने के बहाने वह मौके तलाशता है तो कभी मंदिर या मज़ार पर अपने करीबी की सलामती के मन्नत उतारने के बहाने | दिल तो धड़कता है मगर मज़बूर है क्यूंकी वह मज़दूर है | जो थक के चूर है मगर बस ज़माने के घेरे से मज़बूर है | मन उसका भी होता है लेकर उड़ जाए उसे एक ओर से दूसरे छोर पर मगर पीछे ज़माने और परिवार का घेरा उसे रोक लेता है |
कभी बच्चों के बहाने अपने बचपन को बुलाता है तो कभी उन्हीं के बहाने बच्चा बन धूम मचाता है |
बच्चों के तमाम इच्छाओं के बावज़ूद हिम्मत करता है वह मेले में जाने का | वह भी बहाना ढूंढता है अपने खोए बचपन को ढूँढने का |
उसने फ़िज़ूल की फ़िक्र में अपनका बचपन जोड़ने की बजाय घटा दिया अब उस घटे बचपन में अपने बच्चों के हिस्से के बचपन को जोड़ना चाहता है मगर अब फ़िक्र नही करता है |
घर में उसे कोसा जाता है | उसके खर्च को फ़िज़ूलखर्ची समझा जाता है |
पेट काट कर जीना अगर बचत है तो ये फ़िज़ूलखर्ची मेरे पेट की खपत है |