शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

घेरा

दिल उसका भी धड़कता है | दिल उसके सीने में भी है | मगर दिल के साथ साथ ज़िंदगी में और भी रिश्ते हैं, नाते हैं, रवायते हैं और  सच कहो तो अपने तौर तरीके और वसूल भी हैं जिनसे वह घिरा हुआ है |
दिल की हर वक़्त तो नहीं सुन सकता दिमाग़ भी तो है जो दूरगामी परिणामों के संकेत देता है | वह तो उसकी भी सुनता है |
हमारा समाज आज भी छोटे कस्बों और गाँव में ही बसता है | जो अपने घर की चार दीवारी को तो लाँघ लेता है मगर उसके गाँव की परिधि उसे मज़बूर कर बाँध लेती है | उसे बाँध लेता है एक ऐसे बंधन में जिससे वह आज भी बँधा हुवा है | वह आज़ाद तो हो गया मगर अपने घर की चार दीवारी और ज़रा आगे बढ़ा तो चबूतरे और अपने कस्बे और गाँव रूपी बंधन में बँध गया | दिल कचोट के रह गया मगर उससे भी कहीं ज़रूरी बात उसको लगती है वह है उसका अपना घेरा जिसे वह नहीं तोड़ सकता |
दिल उसका भी होता है मेले में घूमने का और अपने साथी को घुमाने का मगर वह घेरा फान्दने में ना जाने क्यूँ डरता है | शायद उसे खुद पर भरोसा कम है या ज़माने के घेरे में घिर गया है |
कभी दवाई दिलाने के बहाने वह मौके तलाशता है तो कभी मंदिर या मज़ार पर अपने करीबी की सलामती के मन्नत उतारने के बहाने | दिल तो धड़कता है मगर मज़बूर है क्यूंकी वह मज़दूर है | जो थक के चूर है मगर बस ज़माने के घेरे से मज़बूर है | मन उसका भी होता है लेकर उड़ जाए उसे एक ओर से दूसरे छोर पर मगर पीछे ज़माने और परिवार का घेरा उसे रोक लेता है |
कभी बच्चों के बहाने अपने बचपन को बुलाता है तो कभी उन्हीं के बहाने बच्चा बन धूम मचाता है |
बच्चों के तमाम इच्छाओं के बावज़ूद हिम्मत करता है वह मेले में जाने का | वह भी बहाना ढूंढता है अपने खोए बचपन को ढूँढने का |
उसने फ़िज़ूल की फ़िक्र में अपनका बचपन जोड़ने की बजाय घटा दिया अब उस घटे बचपन में अपने बच्चों के हिस्से के बचपन को जोड़ना चाहता है मगर अब फ़िक्र नही करता है |
घर में उसे कोसा जाता है | उसके खर्च को फ़िज़ूलखर्ची समझा जाता है |
पेट काट कर जीना अगर बचत है तो ये फ़िज़ूलखर्ची मेरे पेट की खपत है |

"देश के गद्दारों को................

क्रॉसिंग्स रिपब्लिक गाज़ियाबाद में लगभग २ घंटे संध्या फेरी हुई |
जिनमें प्रथम दो लाइन के नारे गूँजे |  नारा था -
"देश के गद्दारों को
गोली मारो सालों को |"
किंतु नारों पर यदि ध्यान केंद्रित करें तो ना एगो गोली दिखी ना कोई दू नाली |
ज़ुबानी जंग में अब आम जनता भी सम्मिलित हो गयी है |
अरे ऐसे नारों और जुमलों से का होइगा | सब के सब प्रधानमंत्री थोड़े बन जाओगे |
इन दो लाईनों के साथ कुछ लाइन और जोड़ देते तो गद्दारों के ख़ात्मे के साथ साथ कुछ और भी मुनाफ़े हो जाते कि -
कहाँ रख दिए औज़ारों को
ज़रा तेल पीलावो उन भालों को |
सारे वादे अब जुमले हो गये
ज़रा स्विस से लाओ अब मालों को |
सरकार बना ली अफ़ज़ल के किरदारों संग
कश्मीर चलो अब साफ करो उन जालों को |
धैर्य धरो इंतज़ार करो तासीर है ऐसी मेरी इस मिट्टी की
वो दिन दूर न्हीं जब फोड़ देंगे हम सब मिलकर इन छालों को |
Courtesy : हसनैन