सोमवार, 24 मार्च 2014

मुसाफिर

चल चला चल मुसाफिर अपनी राह पर
मंज़िल को तुझसे मिलना पड़ेगा ।
मंज़िल को कितना गुमान है
वो तो बस खड़ी इक मशाल है ।
रुकेगा तू नहीं थकेगा तू नहीं,
थमने की तू ज़हमत ना कर
चलना तो तेरी फितरत में है ।
रुक गया ग़र तू
रुक जायेगा ये सारा जहाँ ।
तू ना होगा तो मंज़िल की क्या मज़ाल है
तुझसे ही रोशन मंज़िल के तख़्त-ओ-ताज़ है ।

रविवार, 23 मार्च 2014

Happy Water's Day...


बिन पानी सब सून,
शरीर मे बहता बनकर मानो खून,
पानी है कुदरत का बून,
मन मे होगा अब ऐसा जुनून,
पानी बचाना है जरुर, 
इस बात की है अब मुझ पे धुन ।

Happy Water's Day...

जीवन है अनमोल,
बिन जल जीवन का क्या मोल ।
जल का हर बून्द है अनमोल,
इस बात से अब कर लो मेलजोल,
क्युकि बिन जल जीवन का क्या मोल ।

विरोधाभास-हर हर मोदी

कभी कभी अफ़सोस होता है तो लिखने बैठ जाता हूँ कि आज इस २१वीं सदी में प्रवेश किया हुवा भारत वर्ष का नागरिक उचित और अनुचित को भेद करने में असमर्थ हैं ।
हमें ये जानना अति आवश्यक है कि सत्य सदैव सत्य है और रहेगा, किन्तु असत्य कितनी ही कोशिश क्यूँ न करले वो सत्य नहीं हो सकता । सत्य की राह कभी कभी कठिन जरुर लगती है किन्तु उसका आनंद परमानन्द है, जो आनंद असत्य राह पर चलने वाला कभी नहीं चख सकता ।

अब आती है बात सत्य और असत्य में भेद करने की जो उससे भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, उसको अपने आचरण में उतारने की और उससे उपजे किसी भी सोच अथवा अभिव्यक्ति को व्यक्त करने की, इसमें भेद करते समय कई मानदंड हमारे उस विचार अथवा सोच में अहम् भूमिका का निर्वाहन करते हैं, अब हमें ये सोचना अति आवश्यक है कि हम इन नाना प्रकार के मानदंडों को किस प्रकार अपने दिल और दिमाग पर हावी होने देते हैं, मानदंड तो कई हैं किन्तु एक मानदंड पर ही मै सोचता हूँ जो हमारे ऊपर बड़ा आघात करता है, वो है कि हम किसी भी सत्यता अथवा असत्यता को न जानते हुए उसके बहाव में बह जाते हैं और नाना प्रकार की टिप्पणियाँ करने में लग जाते हैं ये वाकई में बहुत ही विचित्र है ।

इन्ही सब के बीच एक लोगों कि अभिव्यक्ति नारे के रूप में निकल कर आयी जो आज लोगों में खूब प्रचलित हो रहा है, जिस पर विवादों का ताण्डव धीरे धीरे मंडराना शुरू हो रहा है ।

जो नारा सुनने में आया है वह है 'हर हर मोदी, घर घर मोदी' जो अपने आप में ही पूरा का पूरा विरोधाभास है क्यूंकि उनकी स्वयं की पार्टी में कुछ लोग मोदी को स्वीकार करने में कोताही बरत रहे हैं और कुछ तो इस कारण इनसे अलग हो गए हैं, तो हम कैसे मान ले कि घर घर मोदी विराजमान हो गए हैं ।

किन्तु देश का कुछ एक तपका हर बात से बेखबर हो कर ऐसे नारे देने में लगा हुवा है जो सीधे सीधे अपने घरों से भगवान को ही विस्थापित कर रहा है, और महादेव की जगह मोदी विराजमान हो रहे हैं, क्या विडम्बना है हमारी। कुछ तो बुद्धि, विवेक का इस्तेमाल कर लो मित्रों ।

वो दिन अब दूर नही जब आने वाली पीढी 'हर हर महादेव' भूल 'हर हर मोदी' का जाप करेगा  ।

नारो का जोड तोड करिये किसी ने न ही रोका किन्तु कम से कम भगवान और इन्सान मे फ़र्क तो समझो लोगो, लहर के बहाव मे सम्भालो अपने आप को, कही ऐसा न हो ये सुनामी बन कर हमारे घरो को ही तबाह कर दे, अपनी स्वयं की शक्ति से बेखबर लोगों , अपनी शक्ति को पहचानो ।
एक बात हम सब को जान लेना चाहिए कि ये नेतागण तो एलेक्श्न मात्र तक है उस के बाद कोई झाँकने वाला नही, और दूसरी बात घरो मे सदैव महादेव ही रहने वाले है, ये तो बरसाती मेंढक मात्र है जो पाँच साल में एक बार इस चुनावी मौसम में टर्र टर्र करते हैं और उसके बाद क्या करते हैं हम सब से छुपा हुवा नहीं है । 

गुरुवार, 13 मार्च 2014

आम आदमी की व्यथा

आदरणीय आम आदमी,

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि ये २०१४ इलेक्शन अब बहुत नज़दीक है हर किसी को बड़ी सावधानी और सतर्कता से अपने बुद्धि विवेक के इस्तेमाल से अपनी शक्ति को जताने का एक बार फिर मौका मिला है क्या इस बार भी हमें कोई उल्लू बनाएगा ? क्या इस बार भी हम ठगे जायेंगे ? हर किसी के मन में यही ख्याल आता है नहीं इस बार नहीं , नहीं इस बार तो ऐसा नहीं होना चाहिए । इस बार जो आएगा वो हमारे खोये हुए सम्मान व हर मुरझाये हुए चेहरे को अपने कारनामे से खुश कर देगा ये तो समय बतायेगा । अभी से कुछ भी कहना नाइंसाफी ही होगी । 

इस बार एक और नयी पार्टी 'आप',  इस २०१४ के इलेक्शन को इसने बहुत ही रोचक बना दिया है इस बात का आभास बीजेपी को भी हो रहा है कि ये बिना बात रोड़ा बनकर बीच में आगया वरना मौका इतना बेहतरीन था कि इसको वन-डे क्रिकेट मैच की भांति जीत जाते वो भी बोनस प्वाइन्ट के साथ, किन्तु, समीकरण ख़राब भी हो सकता है, ये तो अब हमारी सीटों में सेंध भी लगा सकता है, जितनी सीटें 'आप' के पक्ष में जाएँगी उतनी दूरी मोदी की कुर्सी को दिल्ली से गुजरात की ओर सरकाएगी। इसलिए कोई गलती न हो इसका भी ख्याल बखूबी रखा जा रहा है , कांग्रेस की पिछली लापरवाहियों का भी इन्हे ख्याल है जो बीजेपी को अपने इस प्रतिद्वंदी को कम नहीं आंकने दे रहा हैं, ये भी अच्छी बात है यदि कोई खिलाडी मैदान में उतरा है तो उसमे कुछ तो हिम्मत है, और ताज़ातरीन दिल्ली के इलेक्शन की याद भी दिल में सजी हुयी है जो भुलाये नहीं भूलती ।

और इस रोचक मुक़ाबले की ज़रूरत भी आन पड़ी थी, क्यूंकि आज जिस मुहाने पर हमारा देश जा पहुंचा है वह विषय निश्चितरूप से विचारणीय है आज हर कोई अपने भीतर के केजरीवाल को जगा रहा है कि अब बहुत देर हो चुकी है, अब तक हमारे देश का आम आदमी मौजूदा पार्टियों पर भरोसा जताते हुए इस देश में राजनितिक गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा और देता रहा, महज़ ये सोच कर की चलो आज नहीं तो कल कुछ बदल जायेगा लेकिन ये तो वाकई में 'कल' बन गया जो कभी आता ही नहीं। जो वाकई चिंता का विषय है कि राजनीती में आम आदमी की भागीदारी नगण्य मात्र एवं नेता और आम आदमी के बीच टूटता नाता, आज पार्टियों का ध्रवीकरण मात्र पैसे वाले लोगों की ओर है न कि आम आदमी पर, टिकटों के बंटवारे में वो ही अहम् भूमिका निभाते हैं, आम आदमी तो उसके सामने बेचारा बन गया है ।
नेता से उनकी दुरी निश्चितरूप से चिंताजनक है आलम ये है के यदि कोई नेता आम आदमी के अपने शहर में भी आजाये तो उसे १०० मीटर की दुरी बनाना अनिवार्य हो गया है , नेता और आम आदमी का नाता टूट चूका है, हर इंसान राजनीती से विवश जान उसके सामने केवल अपने वोटरूपी शक्ति देने के बाद ५ साल तक निहत्था होकर बैठना ही एक चारा मात्र रह गया है  उस वोट के बदले अपने विकास को पूछने का मौका ही कब इन नेतावों ने उन आम आदमी को दिया जिसके वोट से आज ये यहाँ आये हैं,  अब इनसे आम आदमी से कोई सरोकार नहीं, आम आदमी के १ -१ वोट ने इनको इतनी शक्ति प्रदान कर दी कि अब तो इनका इस्टेट्स ही बदल गया अब क्या इन्हे चाहिए जो ये उस नगर या गावों में जाएँ, जहाँ से जीत कर आये हैं और हाँ ये भी है के यदि जिसे कनॉट प्लेस में वहाँ, पान खाने को मिल रहा है जहाँ जवाहर और लालू पान खाते थे तो कोई अपने शहर के चौरसिया जी का पान क्यूँ खायेगा।  अब तो उनका दिल दिल्ली में ही लगता है । हमारे देश के  आम आदमी के लिए अब तो बराक ओबामा से मिलना आसान किन्तु उन्हीं के क्षेत्र सांसद महोदय से मिलना अपाढ़ हो गया है ये जो अंतर, बहुत बड़ा हो गया है जिसकी अति हो गयी है और हम सभी जानते हैं कि अति का अंत निश्चित है|

किन्तु एक बात का तो आभास मुझे व्यक्तिगत रूप से हो रहा है कि इस इलेक्शन में कांग्रेस का सफाया और बहोत हद तक बीजेपी पर गति अवरोधक का काम 'आप' करने वाली है, जो हर नेता के माथे पे सिकन का सबब बन रही है। 

देश में मौजूदा पार्टियों की दशा और दिशा से लोगों का विश्वास बहुत हद तक उठ चूका है जो कि निश्चितरूप से इन पार्टियों पर सवालात करने के लिए हर किसी को मजबुर कर रहा है , देश की जनता को इन लोगों ने इस कदर मजबूर कर दिया के अब कोई आम आदमी में इतनी हिम्मत न है जो इनके समक्ष खड़ा हो पाये, हर किसी में बेचैनी तो ज़रूर थी किन्तु उसका उपाय सुझाये सूझ नहीं रहा था, इसी बीच राजधानी दिल्ली में आंदोलनो का दौर चला और लोगों के आक्रोश की एकजुटता हर भारत के नागरिक में दिखी जिनमे वाकई उस पीड़ा को देखा जा सकता था जो पिछले कुछ वर्षों में यहाँ कि जनता ने महसूस किया और उसके माहौल में अपने आपको जीने के लिए तैयार कर लिया था क्यूंकि सभी जानते हैं कि तंत्र से लड़ना कोई आसान काम नहीं , यह मौका अच्छा था इसलिए हर एक तपका इस आंदोलन में खुलकर अपनी भागीदारी को सिध्द करने कि प्रतिज्ञा लेकर उतरा,  वह इंसान भी सम्मिलित हुवा जो राजनीती को हमेशा गंदे लोगों का कृत्य मानता था क्यूंकि अब ज़रुरत जान पड़ी थी और ये भी जान गए कि अभी नहीं तो कभी नहीं इसीलिए आम आदमी ने अपनी मांग के ज़रिये अपने बल को भुनाने की ठानी इस बात से कांग्रेस पार्टी भी बेख़ौफ़ थी कि उसे इस आंदोलन के सफल होने कि आशंका इतनी न थी कि इनकी दिल्ली की सत्ता को ही उखाड़ फेकेगी।

ये माहौल ऐसा गरमाया जिसमे आम आदमी को एक बार २१वि सदी में इस तरह के आउटडेटेड कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मिला जिसने आंदोलनों को कई मोड़ दिखाए और अन्ततः देश को के एक आम आदमी ने इन मौजूदा नेतावों से इनके पिछले कारनामों का हिसाब लेने के लिए अपने आप को तैयार करने में कोताही नहीं समझी और देश को एक नयी पार्टी देने का निर्णय लिया, इस निर्णय ने कुछ को जोड़ा तो दूसरी तरफ कुछ लोगों को तोडा।

और इन्ही सब के बीच एक नयी पार्टी का उदय, जिन्होंने व्यवहारिक समस्याओं को देश के पटल पर रखते हुए केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी के बीच में उतारा जिसे निश्चितरूप से जनता को स्वीकार्य एवं उनकी भागीदारी को बल प्रदान करता है, क्यूंकि पहली बार आम आदमी ने जातिवाद, असामनता तथा अन्य कई बुराइयों को कोई जगह न देते हुए बल्कि देश में व्याप्त समस्याओं जो एक आम आदमी की निजी ज़िन्दगी में रोज़ उनसे सामना कराती है  इसने उन समस्याओं को बुनियादी तौर पर इनके हल ईमानदारी से जन जन तक पहुँचाने का प्रयत्न करने का वादा किया है, येही मुहिम इसे हर एक पार्टी से भिन्न करती है, इसने अपने आग़ाज़ से ही अन्य पार्टियों को बहुत हद तक चौकन्ना कर दिया है हमें इस उपलब्धि को कम नहीं आंकना चाहिए |
हर पार्टी कहती है हम इनसे कुछ नहीं सीखते ये तो स्वयं ही भ्रष्ट हैं किन्तु अंदर ही अंदर जो इस राजनीती का मज़ा आगे के लिए चखना चाहता है उसने अपने स्वाभाव में बहुत हद तक तबदीली लाने का मन बनाया है ।

हमारे चारों ओर ऐसी पार्टियां हैं जिनके बारे में हम चित परिचित हैं, कोई किसी से कम नहीं जब जब जिसको हमने मौका दिया उसने हमें धोखा दिया और हमारे विश्वास को तोडा है । मैं मानता हूँ कि कांग्रेस कि नाकामियों ने दूसरी बड़ी पार्टी बीजेपी को बाई डिफ़ॉल्ट प्रबल दावेदार के रूप में खड़ा कर दिया है, जो कि बाई डिफ़ॉल्ट है, किन्तु इस पार्टी के कारनामों से हम सब अवगत है, और एक नए चेहरे के चुनावी भाषण ने लोगों में हुंकार भर दिया है किन्तु इस बात को हमें समझ लेना चाहिए कि ये सब खोखले सपने दिखाने में माहिर हैं अपनी ब्रांडिंग कैसे करनी है उसके लिए भी इन्होने खूब लोगों की जेबें टटोलीं हैं अपने इस लहर के कहर से एक बार फिर आम आदमी पर हावी होने कि कोशिश हुयी है, क्या आम आदमी फिर से इन्ही लहरों के वेग में बह जायेगा या अपने पुरे आत्मविश्वाश के साथ सोचा समझा निर्णय ले पायेगा ?

ऐसा नहीं कि आज ये पार्टियां पूरी तरह से अपना स्वरुप बदलने को तैयार है, आज भी ये पार्टियां आम आदमी को बाँट उनके वोट बैंक पर अपना ध्यान केंद्रित करती है, इस वोट बैंक के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं ये किसी भी तरह का ज़हर घोलने से बाज़ नहीं आते, सारे नए पुराने किस्से हमें मालूम है अब हमारी बारी है, और फैसला हमारा होगा कि हमें किस ओर करवट लेनी चाहिए ।

अब एक सन्देश जो देश के हर जन जन तक पहुँचाना चाहता हूँ जो मेरा नहीं बल्कि आम आदमी का आम आदमी के लिए ही है जिसका हनन आज तक होता आया है किन्तु इस बार ऐसा न होने दें |
आम आदमी के इस फैसले से हम देश नहीं बल्कि सोच बदलने जा रहे हैं १ सोच जो जीवन में नयी उमंग और तरंग ला सकती है, क्या इस बार सत्ता में काबिज सरकार हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगी, ये तो निश्चितरूप से समय बतायेगा ।

अब हम पर यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गयी है और इनको सबक सीखने का मौका भी, यदि आम आदमी अपनी शक्ति को प्रदर्शित करना चाहता है और अपना खोया हुवा नाता वापस लाना चाहता है तो इस बार क्या हमारी कोई रणनीति है या इस बार भी हम हर बार की भांति फिर से ठग लिए जायेंगे, देखते हैं, अब तो हम सब को चुनाव तक इंतज़ार और फिर सत्ता में आयी सरकार के सरोकार से ही मालूम पड़ेगा कि इस बार आम आदमी के हाथ क्या लगा है । या फिर से वही पुराना ढर्रा ।

सधन्यवाद !!!!

बुधवार, 5 मार्च 2014

चुनावी रंग में फेसबुक समर्थक और जनता!!!

चुनावी मौसम में रंग बदलता फेसबुक, हर कोई मानो अपने दोस्तों की दोस्ती को भूल कर इन बहुरुपिया नेतावों के चंगुल में फँस गया हो, बस लोग बाग़ केवल चुनावी पेज़ शेयर, लाइक और कमेंट फूंकने में लगे हुए है, अब किसी को यारों की यारी सूझ नहीं पड़ती, अपनी फोटो सभी भूल बैठे हैं, हर कोई मोदी और केजरीवाल के रंग में रंगा नज़र आ रहा है मानो हर एक समर्थक को वोट बटोरने का ठेका दे दिया गया है कि जो जितना शेयर और लाइक करेगा मानो नेता जी के पक्ष में उतना ही वोट गिरेगा या ये कहें कि ये भी एक पैमाना जान पड़ता है कि इस बार किसकी सरकार बनने वाली है, अगर पूर्ण रूप से इसको ही पैमाना मान लिया जाये तो 'तीसरा मोर्चा' एक कोने में दुपका हुवा भी नज़र नहीं आता है।
अब बात करते हैं इन समर्थकों कि जो बहुत ही उत्साहित हैं आजकल, मैं तो इन समर्थकों को तीन भागों में बाँट कर देख रहा हूँ, जिसमे तीन तरह के समर्थक जान पड़ते हैं, एक तो वो बस किसी के शेयर में हामी वाली मुंडी हिला कर लाइक करके कट ले रहे हैं, वो अपनी अभिव्यक्ति किसी को प्रदर्शित नहीं करना चाह रहे हैं कि वो किस तरफ करवट लेंगे।
दूसरे प्रकार के समर्थक जो शेयर किये हुए तस्वीर की तारीफ़ में कुछ कुछ कमेंट देने से नहीं चूक रहे है मानो शेयर करने वाले की हौसला आफ़ज़ाई करने की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने ही ले रखी है, और अपने साथी की इस कोशिश को बल देने में लगे हुए हैं । एक केजरीवाल की तारीफ में कुछ कमेंट लिख रहा है तो दूसरा उसका कटाक्ष और फिर पहले वाला अपनी बात की पुष्टि कर रहा है, और यदि इनमे से असमर्थ है तो उसी कमेंट को लाइक कर फिर सेकटने में देरी नहीं लगा रहा है, ये तो रहा कमेंट वाला समर्थक । 
और अब बारी आती है अंतिम प्रकार के समर्थक की जो उसको शेयर करने में चूक ही नहीं रहे हैं वो अपने आप को सबसे बड़े समर्थक के रूप में देख रहे हैं, उन्हें इस बात से कत्तई लेना देना नहीं कि शेयर की हुयी तस्वीर में कितनी सच्चाई है बस वो तो उसको आगे दूसरों के लिए परोस दे रहे हैं कि कितना ज्यादा ज्यादा लोगों तक पहुँच जाये उसके प्रभाव अथवा दुष्प्रभाव से उनका कोई वास्ता ही नहीं। 
क्या आप सब लोगों को नहीं लगता कि ये सोशल नेटवर्किंग की मूलभूत परिभाषा को ही बदलने का काम कर रहा है, मेरा मत तो ये है की सोशल नेटवर्किंग का उद्देश्य है कि १ दूसरे का सहयोग, दोस्ती, प्रेम और १ दूसरे से जुड़े रहने कि प्रेरणा का सन्देश देना न कि द्वेष और दूरी को बढ़ाया जाना , किन्तु इस राजनीतिक माहौल ने तो यहाँ इस सोशल नेटवर्किंग के पटल को भी दूषित करने का जैसे जिम्मा ही ले लिया हो ।
किन्तु कोई चिंता की बात नहीं ये तो बस एक चुनावी बादल हैं जो ज्यादा दिन तक टिकने वाले नहीं है, अभी हमारे दिल-ओ-दिमाग पर छाए हुए हैं ये तो बस चुनाव मात्र तक ही सीमित हैं जल्द ही सारे बादल छँट जायेंगे और हम वापस फिर से उसी ज़िन्दगी की जद्दोजहद में अपने आपको समेट अपने रोज़मर्रा के काम पर लग जायेंगे, अभी भी लगे हुए हैं किन्तु दिमागी कसरत इस ओर हो रही है माहौल ही कुछ ऐसा है । ऐसा नहीं की नेता इस बात से इत्तेफ़ाक़  नहीं रखते हैं कि ५ साल तो खूब मौज और मस्ती कर लिए हैं अब थोड़ा क़यूस्चन बैंक भी देख लो क्या पता कुछ इसी में से फस जाये बाकी इन्हे ये भी पता है की कापी जाँचने वाले को खुद ही कुछ नहीं आता तो हमको फेल कौन करेगा ।
कांपी जांचने वाला कोई नहीं बल्कि हम जनता ही हैं जो इन्हे पास और फेल करते हैं हम सब तो आशावादी हैं इसीलिए तो कभी अन्ना को गाँधी, केजरीवाल में शिव का रूप जो हर विष को पी लेगा और मोदी को मसीहा जो अपने आचार विचार से सब लोगों में जोश भर देगा और स्वावलम्बन परोस देगा, किन्तु हम सब को ये जान लेना चाहिए की इस मिलावटी ज़माने में इन सब लोगों से उम्मीद लगाना महज़ अपने आप को संतोष देने के बराबर है । यदि हम अपना उत्थान व विकास चाहते हैं तो वह हमारी स्वयं कि मेहनत और लगन से मिलने वाला है, इन लोगों के खोखले आश्वासन से तो बस इंतज़ार करते रहो अगर कुछ हो जाये तो बल्ले बल्ले  नहीं तो थल्ले थल्ले तो हैं ही ।