शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

थूक कर चाटना किसे कहते हैं यह vedio देखिए |

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थूक कर चाटना किसे कहते हैं यह vedio देखिए |

राजनीति एक अवसरवादिता है | वैचारिक मूल्यों को दरकिनार करती देश की राजनीति |

अब तो यही लगता है -

क्या वह देश की भुखमरी दूर करेंगे ?
जिन्हे खुद सत्ता की भूख लगी हो | |



गुरुवार, 20 जुलाई 2017

ज़िम्मेदार नागरिक बनें

"वोट" दिया बहुत बढ़िया ।
 
किंतु उसके बाद एक और चीज़ होती है, वो है "चोट" ।

यदि सत्ताधरियों को यह ना मिले तो उनमें एक अलग तरह की "खोट " व्याप्त हो जाती है ।
 
यह काम केवल किन्ही चन्द civil society मात्र का काम नहीं बल्कि हर ज़िम्मेदार नागरिक का है ।
 
अतः अपनी ज़िम्मेदारी समझें वोट देकर सत्ताधरियों को अखरोट ना खाने दें ।
 
अपनी पढ़ाई, कमाई और दवाई के लिए अपने सामर्थ्य के साथ साथ सरकारों के सामर्थ्य की भी ख़ून जाँच करवाते रहें ।
हसनैन ।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

धक्का सहे ग़ाज़ी मियाँ मज़ा ले गये मुज़ावर |



पहले मंत्रालय से बहिष्कृति और फिर कयास यही लगाए जा रहे थे कि PM की गद्दी भले ही नहीं मिली किंतु संवैधानिक कुर्सी पर तो वह ही बैठेंगे |

मगर सारे कयास फेल हुए और राजनीतिक गलियारों मे ऐसा नाम उछाला कि कई राजनीतिक दलों के दाँतों तले उँगलिया दबाने के सिवा कुछ और ना था |
जैसे कुश्ती मे दाँव से खेल पर विजय हासिल की जाती है यही खेल राजनीति का भी है एक भी दाँव ग़लत पड़ा तो सीधे मुँह की खानी पड़ती है |
कुछ भी हो उन्होनें ने वीरता और सहनशीलता का परिचय दिया है । साथ ही मैं भाजपा की दूरदृष्टता की तारीफ़ करता हूँ । यह लोग लम्बी रेस के घोड़े हैं ।
अब भाजपा की राजनीतिक इतिहास का नया अध्याय शुरू हो चुका है । अभी कई अध्याय लिखे जाने बाकी हैं ।
जो लोग इनके पतन के सपने देखते हैं वह बहुत पिछड़ चुके हैं ।

हर दाँव हिंदुस्तान की सरजमीं पर मानिए अंगद के पाँव की आहट दिलाते हैं । जिसको हटाना, क्या हिला पाना किसी राजनीतिज्ञ के बस की बात नहीं ।

देखते हैं तो कुछ कह भी दिया करें |

देखते हैं तो कुछ कह भी दिया करें |

कभी कभी कही बातें सरकार तक ना पहुँचे लेकिन वह उपर वाला है ना, वह तो ज़रूर सुनता है क्यूंकी वह तो कण कण में है | हाँ ये ज़रूर है कि बहुत देर मे सुनता है | लेकिन जब सुनता है तो देखने वाले सिर्फ़ देखते ही रह जाते हैं | 

इसलिए कहा कीजिए | नहीं कहेंगे तो शिकायत किससे करेंगे |

कल गुड़गाँव से लौटते वक़्त मेट्रो के धीमी रफ़्तार के कारण AIIMS के ही मेट्रो स्टेशन पर उतर गया । सोचा अब cab से चलता हुँ यहाँ से ring road पकड़ कर कुछ ही मिनट में DND होते हुए Crossings Republik पहुँच जाऊँगा ।
किंतु बाहर निकलते ही वहाँ के दृश्य देख मैं दंग था । यह सोच रहा था कि एक तस्वीर यह भी है मेरे देश की राजधानी की और मेरा दिल अन्दर से चीख़ रहा था और इस बात की गवाही दे रहा था कि "अच्छे दिन अभी नहीं आए हैं " |

जहाँ तमाम ख़र्च कर RCR या महज़ एक जगह के नाम बदलने पर कर दिए जाते हों क्या इन बिमरियों से जूझ रहे उनके परिजनों के लिए एक ऐसा हाल नहीं बन सकता जिसमें वह कम से कम एक रात गुज़ार सकें ।
या फिर यह भी सियासत एक हिस्सा है यह दिखाने के लिए की समाज यह देख कर ख़ुद ही आत्मसात हो जाए कि जनसंख्या इतनी है कि सब नामुमकिन है ।
हसनैन