आदरणीय आम आदमी,
जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि ये २०१४ इलेक्शन अब बहुत नज़दीक है हर किसी को बड़ी सावधानी और सतर्कता से अपने बुद्धि विवेक के इस्तेमाल से अपनी शक्ति को जताने का एक बार फिर मौका मिला है क्या इस बार भी हमें कोई उल्लू बनाएगा ? क्या इस बार भी हम ठगे जायेंगे ? हर किसी के मन में यही ख्याल आता है नहीं इस बार नहीं , नहीं इस बार तो ऐसा नहीं होना चाहिए । इस बार जो आएगा वो हमारे खोये हुए सम्मान व हर मुरझाये हुए चेहरे को अपने कारनामे से खुश कर देगा ये तो समय बतायेगा । अभी से कुछ भी कहना नाइंसाफी ही होगी ।
इस बार एक और नयी पार्टी 'आप', इस २०१४ के इलेक्शन को इसने बहुत ही रोचक बना दिया है इस बात का आभास बीजेपी को भी हो रहा है कि ये बिना बात रोड़ा बनकर बीच में आगया वरना मौका इतना बेहतरीन था कि इसको वन-डे क्रिकेट मैच की भांति जीत जाते वो भी बोनस प्वाइन्ट के साथ, किन्तु, समीकरण ख़राब भी हो सकता है, ये तो अब हमारी सीटों में सेंध भी लगा सकता है, जितनी सीटें 'आप' के पक्ष में जाएँगी उतनी दूरी मोदी की कुर्सी को दिल्ली से गुजरात की ओर सरकाएगी। इसलिए कोई गलती न हो इसका भी ख्याल बखूबी रखा जा रहा है , कांग्रेस की पिछली लापरवाहियों का भी इन्हे ख्याल है जो बीजेपी को अपने इस प्रतिद्वंदी को कम नहीं आंकने दे रहा हैं, ये भी अच्छी बात है यदि कोई खिलाडी मैदान में उतरा है तो उसमे कुछ तो हिम्मत है, और ताज़ातरीन दिल्ली के इलेक्शन की याद भी दिल में सजी हुयी है जो भुलाये नहीं भूलती ।
और इस रोचक मुक़ाबले की ज़रूरत भी आन पड़ी थी, क्यूंकि आज जिस मुहाने पर हमारा देश जा पहुंचा है वह विषय निश्चितरूप से विचारणीय है आज हर कोई अपने भीतर के केजरीवाल को जगा रहा है कि अब बहुत देर हो चुकी है, अब तक हमारे देश का आम आदमी मौजूदा पार्टियों पर भरोसा जताते हुए इस देश में राजनितिक गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा और देता रहा, महज़ ये सोच कर की चलो आज नहीं तो कल कुछ बदल जायेगा लेकिन ये तो वाकई में 'कल' बन गया जो कभी आता ही नहीं। जो वाकई चिंता का विषय है कि राजनीती में आम आदमी की भागीदारी नगण्य मात्र एवं नेता और आम आदमी के बीच टूटता नाता, आज पार्टियों का ध्रवीकरण मात्र पैसे वाले लोगों की ओर है न कि आम आदमी पर, टिकटों के बंटवारे में वो ही अहम् भूमिका निभाते हैं, आम आदमी तो उसके सामने बेचारा बन गया है ।
नेता से उनकी दुरी निश्चितरूप से चिंताजनक है आलम ये है के यदि कोई नेता आम आदमी के अपने शहर में भी आजाये तो उसे १०० मीटर की दुरी बनाना अनिवार्य हो गया है , नेता और आम आदमी का नाता टूट चूका है, हर इंसान राजनीती से विवश जान उसके सामने केवल अपने वोटरूपी शक्ति देने के बाद ५ साल तक निहत्था होकर बैठना ही एक चारा मात्र रह गया है उस वोट के बदले अपने विकास को पूछने का मौका ही कब इन नेतावों ने उन आम आदमी को दिया जिसके वोट से आज ये यहाँ आये हैं, अब इनसे आम आदमी से कोई सरोकार नहीं, आम आदमी के १ -१ वोट ने इनको इतनी शक्ति प्रदान कर दी कि अब तो इनका इस्टेट्स ही बदल गया अब क्या इन्हे चाहिए जो ये उस नगर या गावों में जाएँ, जहाँ से जीत कर आये हैं और हाँ ये भी है के यदि जिसे कनॉट प्लेस में वहाँ, पान खाने को मिल रहा है जहाँ जवाहर और लालू पान खाते थे तो कोई अपने शहर के चौरसिया जी का पान क्यूँ खायेगा। अब तो उनका दिल दिल्ली में ही लगता है । हमारे देश के आम आदमी के लिए अब तो बराक ओबामा से मिलना आसान किन्तु उन्हीं के क्षेत्र सांसद महोदय से मिलना अपाढ़ हो गया है ये जो अंतर, बहुत बड़ा हो गया है जिसकी अति हो गयी है और हम सभी जानते हैं कि अति का अंत निश्चित है|
किन्तु एक बात का तो आभास मुझे व्यक्तिगत रूप से हो रहा है कि इस इलेक्शन में कांग्रेस का सफाया और बहोत हद तक बीजेपी पर गति अवरोधक का काम 'आप' करने वाली है, जो हर नेता के माथे पे सिकन का सबब बन रही है।
देश में मौजूदा पार्टियों की दशा और दिशा से लोगों का विश्वास बहुत हद तक उठ चूका है जो कि निश्चितरूप से इन पार्टियों पर सवालात करने के लिए हर किसी को मजबुर कर रहा है , देश की जनता को इन लोगों ने इस कदर मजबूर कर दिया के अब कोई आम आदमी में इतनी हिम्मत न है जो इनके समक्ष खड़ा हो पाये, हर किसी में बेचैनी तो ज़रूर थी किन्तु उसका उपाय सुझाये सूझ नहीं रहा था, इसी बीच राजधानी दिल्ली में आंदोलनो का दौर चला और लोगों के आक्रोश की एकजुटता हर भारत के नागरिक में दिखी जिनमे वाकई उस पीड़ा को देखा जा सकता था जो पिछले कुछ वर्षों में यहाँ कि जनता ने महसूस किया और उसके माहौल में अपने आपको जीने के लिए तैयार कर लिया था क्यूंकि सभी जानते हैं कि तंत्र से लड़ना कोई आसान काम नहीं , यह मौका अच्छा था इसलिए हर एक तपका इस आंदोलन में खुलकर अपनी भागीदारी को सिध्द करने कि प्रतिज्ञा लेकर उतरा, वह इंसान भी सम्मिलित हुवा जो राजनीती को हमेशा गंदे लोगों का कृत्य मानता था क्यूंकि अब ज़रुरत जान पड़ी थी और ये भी जान गए कि अभी नहीं तो कभी नहीं इसीलिए आम आदमी ने अपनी मांग के ज़रिये अपने बल को भुनाने की ठानी इस बात से कांग्रेस पार्टी भी बेख़ौफ़ थी कि उसे इस आंदोलन के सफल होने कि आशंका इतनी न थी कि इनकी दिल्ली की सत्ता को ही उखाड़ फेकेगी।
ये माहौल ऐसा गरमाया जिसमे आम आदमी को एक बार २१वि सदी में इस तरह के आउटडेटेड कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मिला जिसने आंदोलनों को कई मोड़ दिखाए और अन्ततः देश को के एक आम आदमी ने इन मौजूदा नेतावों से इनके पिछले कारनामों का हिसाब लेने के लिए अपने आप को तैयार करने में कोताही नहीं समझी और देश को एक नयी पार्टी देने का निर्णय लिया, इस निर्णय ने कुछ को जोड़ा तो दूसरी तरफ कुछ लोगों को तोडा।
और इन्ही सब के बीच एक नयी पार्टी का उदय, जिन्होंने व्यवहारिक समस्याओं को देश के पटल पर रखते हुए केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी के बीच में उतारा जिसे निश्चितरूप से जनता को स्वीकार्य एवं उनकी भागीदारी को बल प्रदान करता है, क्यूंकि पहली बार आम आदमी ने जातिवाद, असामनता तथा अन्य कई बुराइयों को कोई जगह न देते हुए बल्कि देश में व्याप्त समस्याओं जो एक आम आदमी की निजी ज़िन्दगी में रोज़ उनसे सामना कराती है इसने उन समस्याओं को बुनियादी तौर पर इनके हल ईमानदारी से जन जन तक पहुँचाने का प्रयत्न करने का वादा किया है, येही मुहिम इसे हर एक पार्टी से भिन्न करती है, इसने अपने आग़ाज़ से ही अन्य पार्टियों को बहुत हद तक चौकन्ना कर दिया है हमें इस उपलब्धि को कम नहीं आंकना चाहिए |
हर पार्टी कहती है हम इनसे कुछ नहीं सीखते ये तो स्वयं ही भ्रष्ट हैं किन्तु अंदर ही अंदर जो इस राजनीती का मज़ा आगे के लिए चखना चाहता है उसने अपने स्वाभाव में बहुत हद तक तबदीली लाने का मन बनाया है ।
हमारे चारों ओर ऐसी पार्टियां हैं जिनके बारे में हम चित परिचित हैं, कोई किसी से कम नहीं जब जब जिसको हमने मौका दिया उसने हमें धोखा दिया और हमारे विश्वास को तोडा है । मैं मानता हूँ कि कांग्रेस कि नाकामियों ने दूसरी बड़ी पार्टी बीजेपी को बाई डिफ़ॉल्ट प्रबल दावेदार के रूप में खड़ा कर दिया है, जो कि बाई डिफ़ॉल्ट है, किन्तु इस पार्टी के कारनामों से हम सब अवगत है, और एक नए चेहरे के चुनावी भाषण ने लोगों में हुंकार भर दिया है किन्तु इस बात को हमें समझ लेना चाहिए कि ये सब खोखले सपने दिखाने में माहिर हैं अपनी ब्रांडिंग कैसे करनी है उसके लिए भी इन्होने खूब लोगों की जेबें टटोलीं हैं अपने इस लहर के कहर से एक बार फिर आम आदमी पर हावी होने कि कोशिश हुयी है, क्या आम आदमी फिर से इन्ही लहरों के वेग में बह जायेगा या अपने पुरे आत्मविश्वाश के साथ सोचा समझा निर्णय ले पायेगा ?
ऐसा नहीं कि आज ये पार्टियां पूरी तरह से अपना स्वरुप बदलने को तैयार है, आज भी ये पार्टियां आम आदमी को बाँट उनके वोट बैंक पर अपना ध्यान केंद्रित करती है, इस वोट बैंक के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं ये किसी भी तरह का ज़हर घोलने से बाज़ नहीं आते, सारे नए पुराने किस्से हमें मालूम है अब हमारी बारी है, और फैसला हमारा होगा कि हमें किस ओर करवट लेनी चाहिए ।
अब एक सन्देश जो देश के हर जन जन तक पहुँचाना चाहता हूँ जो मेरा नहीं बल्कि आम आदमी का आम आदमी के लिए ही है जिसका हनन आज तक होता आया है किन्तु इस बार ऐसा न होने दें |
आम आदमी के इस फैसले से हम देश नहीं बल्कि सोच बदलने जा रहे हैं १ सोच जो जीवन में नयी उमंग और तरंग ला सकती है, क्या इस बार सत्ता में काबिज सरकार हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगी, ये तो निश्चितरूप से समय बतायेगा ।
अब हम पर यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गयी है और इनको सबक सीखने का मौका भी, यदि आम आदमी अपनी शक्ति को प्रदर्शित करना चाहता है और अपना खोया हुवा नाता वापस लाना चाहता है तो इस बार क्या हमारी कोई रणनीति है या इस बार भी हम हर बार की भांति फिर से ठग लिए जायेंगे, देखते हैं, अब तो हम सब को चुनाव तक इंतज़ार और फिर सत्ता में आयी सरकार के सरोकार से ही मालूम पड़ेगा कि इस बार आम आदमी के हाथ क्या लगा है । या फिर से वही पुराना ढर्रा ।
सधन्यवाद !!!!
जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि ये २०१४ इलेक्शन अब बहुत नज़दीक है हर किसी को बड़ी सावधानी और सतर्कता से अपने बुद्धि विवेक के इस्तेमाल से अपनी शक्ति को जताने का एक बार फिर मौका मिला है क्या इस बार भी हमें कोई उल्लू बनाएगा ? क्या इस बार भी हम ठगे जायेंगे ? हर किसी के मन में यही ख्याल आता है नहीं इस बार नहीं , नहीं इस बार तो ऐसा नहीं होना चाहिए । इस बार जो आएगा वो हमारे खोये हुए सम्मान व हर मुरझाये हुए चेहरे को अपने कारनामे से खुश कर देगा ये तो समय बतायेगा । अभी से कुछ भी कहना नाइंसाफी ही होगी ।
इस बार एक और नयी पार्टी 'आप', इस २०१४ के इलेक्शन को इसने बहुत ही रोचक बना दिया है इस बात का आभास बीजेपी को भी हो रहा है कि ये बिना बात रोड़ा बनकर बीच में आगया वरना मौका इतना बेहतरीन था कि इसको वन-डे क्रिकेट मैच की भांति जीत जाते वो भी बोनस प्वाइन्ट के साथ, किन्तु, समीकरण ख़राब भी हो सकता है, ये तो अब हमारी सीटों में सेंध भी लगा सकता है, जितनी सीटें 'आप' के पक्ष में जाएँगी उतनी दूरी मोदी की कुर्सी को दिल्ली से गुजरात की ओर सरकाएगी। इसलिए कोई गलती न हो इसका भी ख्याल बखूबी रखा जा रहा है , कांग्रेस की पिछली लापरवाहियों का भी इन्हे ख्याल है जो बीजेपी को अपने इस प्रतिद्वंदी को कम नहीं आंकने दे रहा हैं, ये भी अच्छी बात है यदि कोई खिलाडी मैदान में उतरा है तो उसमे कुछ तो हिम्मत है, और ताज़ातरीन दिल्ली के इलेक्शन की याद भी दिल में सजी हुयी है जो भुलाये नहीं भूलती ।
और इस रोचक मुक़ाबले की ज़रूरत भी आन पड़ी थी, क्यूंकि आज जिस मुहाने पर हमारा देश जा पहुंचा है वह विषय निश्चितरूप से विचारणीय है आज हर कोई अपने भीतर के केजरीवाल को जगा रहा है कि अब बहुत देर हो चुकी है, अब तक हमारे देश का आम आदमी मौजूदा पार्टियों पर भरोसा जताते हुए इस देश में राजनितिक गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा और देता रहा, महज़ ये सोच कर की चलो आज नहीं तो कल कुछ बदल जायेगा लेकिन ये तो वाकई में 'कल' बन गया जो कभी आता ही नहीं। जो वाकई चिंता का विषय है कि राजनीती में आम आदमी की भागीदारी नगण्य मात्र एवं नेता और आम आदमी के बीच टूटता नाता, आज पार्टियों का ध्रवीकरण मात्र पैसे वाले लोगों की ओर है न कि आम आदमी पर, टिकटों के बंटवारे में वो ही अहम् भूमिका निभाते हैं, आम आदमी तो उसके सामने बेचारा बन गया है ।
नेता से उनकी दुरी निश्चितरूप से चिंताजनक है आलम ये है के यदि कोई नेता आम आदमी के अपने शहर में भी आजाये तो उसे १०० मीटर की दुरी बनाना अनिवार्य हो गया है , नेता और आम आदमी का नाता टूट चूका है, हर इंसान राजनीती से विवश जान उसके सामने केवल अपने वोटरूपी शक्ति देने के बाद ५ साल तक निहत्था होकर बैठना ही एक चारा मात्र रह गया है उस वोट के बदले अपने विकास को पूछने का मौका ही कब इन नेतावों ने उन आम आदमी को दिया जिसके वोट से आज ये यहाँ आये हैं, अब इनसे आम आदमी से कोई सरोकार नहीं, आम आदमी के १ -१ वोट ने इनको इतनी शक्ति प्रदान कर दी कि अब तो इनका इस्टेट्स ही बदल गया अब क्या इन्हे चाहिए जो ये उस नगर या गावों में जाएँ, जहाँ से जीत कर आये हैं और हाँ ये भी है के यदि जिसे कनॉट प्लेस में वहाँ, पान खाने को मिल रहा है जहाँ जवाहर और लालू पान खाते थे तो कोई अपने शहर के चौरसिया जी का पान क्यूँ खायेगा। अब तो उनका दिल दिल्ली में ही लगता है । हमारे देश के आम आदमी के लिए अब तो बराक ओबामा से मिलना आसान किन्तु उन्हीं के क्षेत्र सांसद महोदय से मिलना अपाढ़ हो गया है ये जो अंतर, बहुत बड़ा हो गया है जिसकी अति हो गयी है और हम सभी जानते हैं कि अति का अंत निश्चित है|
किन्तु एक बात का तो आभास मुझे व्यक्तिगत रूप से हो रहा है कि इस इलेक्शन में कांग्रेस का सफाया और बहोत हद तक बीजेपी पर गति अवरोधक का काम 'आप' करने वाली है, जो हर नेता के माथे पे सिकन का सबब बन रही है।
देश में मौजूदा पार्टियों की दशा और दिशा से लोगों का विश्वास बहुत हद तक उठ चूका है जो कि निश्चितरूप से इन पार्टियों पर सवालात करने के लिए हर किसी को मजबुर कर रहा है , देश की जनता को इन लोगों ने इस कदर मजबूर कर दिया के अब कोई आम आदमी में इतनी हिम्मत न है जो इनके समक्ष खड़ा हो पाये, हर किसी में बेचैनी तो ज़रूर थी किन्तु उसका उपाय सुझाये सूझ नहीं रहा था, इसी बीच राजधानी दिल्ली में आंदोलनो का दौर चला और लोगों के आक्रोश की एकजुटता हर भारत के नागरिक में दिखी जिनमे वाकई उस पीड़ा को देखा जा सकता था जो पिछले कुछ वर्षों में यहाँ कि जनता ने महसूस किया और उसके माहौल में अपने आपको जीने के लिए तैयार कर लिया था क्यूंकि सभी जानते हैं कि तंत्र से लड़ना कोई आसान काम नहीं , यह मौका अच्छा था इसलिए हर एक तपका इस आंदोलन में खुलकर अपनी भागीदारी को सिध्द करने कि प्रतिज्ञा लेकर उतरा, वह इंसान भी सम्मिलित हुवा जो राजनीती को हमेशा गंदे लोगों का कृत्य मानता था क्यूंकि अब ज़रुरत जान पड़ी थी और ये भी जान गए कि अभी नहीं तो कभी नहीं इसीलिए आम आदमी ने अपनी मांग के ज़रिये अपने बल को भुनाने की ठानी इस बात से कांग्रेस पार्टी भी बेख़ौफ़ थी कि उसे इस आंदोलन के सफल होने कि आशंका इतनी न थी कि इनकी दिल्ली की सत्ता को ही उखाड़ फेकेगी।
ये माहौल ऐसा गरमाया जिसमे आम आदमी को एक बार २१वि सदी में इस तरह के आउटडेटेड कार्यक्रम में सम्मिलित होने का अवसर मिला जिसने आंदोलनों को कई मोड़ दिखाए और अन्ततः देश को के एक आम आदमी ने इन मौजूदा नेतावों से इनके पिछले कारनामों का हिसाब लेने के लिए अपने आप को तैयार करने में कोताही नहीं समझी और देश को एक नयी पार्टी देने का निर्णय लिया, इस निर्णय ने कुछ को जोड़ा तो दूसरी तरफ कुछ लोगों को तोडा।
और इन्ही सब के बीच एक नयी पार्टी का उदय, जिन्होंने व्यवहारिक समस्याओं को देश के पटल पर रखते हुए केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी के बीच में उतारा जिसे निश्चितरूप से जनता को स्वीकार्य एवं उनकी भागीदारी को बल प्रदान करता है, क्यूंकि पहली बार आम आदमी ने जातिवाद, असामनता तथा अन्य कई बुराइयों को कोई जगह न देते हुए बल्कि देश में व्याप्त समस्याओं जो एक आम आदमी की निजी ज़िन्दगी में रोज़ उनसे सामना कराती है इसने उन समस्याओं को बुनियादी तौर पर इनके हल ईमानदारी से जन जन तक पहुँचाने का प्रयत्न करने का वादा किया है, येही मुहिम इसे हर एक पार्टी से भिन्न करती है, इसने अपने आग़ाज़ से ही अन्य पार्टियों को बहुत हद तक चौकन्ना कर दिया है हमें इस उपलब्धि को कम नहीं आंकना चाहिए |
हर पार्टी कहती है हम इनसे कुछ नहीं सीखते ये तो स्वयं ही भ्रष्ट हैं किन्तु अंदर ही अंदर जो इस राजनीती का मज़ा आगे के लिए चखना चाहता है उसने अपने स्वाभाव में बहुत हद तक तबदीली लाने का मन बनाया है ।
हमारे चारों ओर ऐसी पार्टियां हैं जिनके बारे में हम चित परिचित हैं, कोई किसी से कम नहीं जब जब जिसको हमने मौका दिया उसने हमें धोखा दिया और हमारे विश्वास को तोडा है । मैं मानता हूँ कि कांग्रेस कि नाकामियों ने दूसरी बड़ी पार्टी बीजेपी को बाई डिफ़ॉल्ट प्रबल दावेदार के रूप में खड़ा कर दिया है, जो कि बाई डिफ़ॉल्ट है, किन्तु इस पार्टी के कारनामों से हम सब अवगत है, और एक नए चेहरे के चुनावी भाषण ने लोगों में हुंकार भर दिया है किन्तु इस बात को हमें समझ लेना चाहिए कि ये सब खोखले सपने दिखाने में माहिर हैं अपनी ब्रांडिंग कैसे करनी है उसके लिए भी इन्होने खूब लोगों की जेबें टटोलीं हैं अपने इस लहर के कहर से एक बार फिर आम आदमी पर हावी होने कि कोशिश हुयी है, क्या आम आदमी फिर से इन्ही लहरों के वेग में बह जायेगा या अपने पुरे आत्मविश्वाश के साथ सोचा समझा निर्णय ले पायेगा ?
ऐसा नहीं कि आज ये पार्टियां पूरी तरह से अपना स्वरुप बदलने को तैयार है, आज भी ये पार्टियां आम आदमी को बाँट उनके वोट बैंक पर अपना ध्यान केंद्रित करती है, इस वोट बैंक के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं ये किसी भी तरह का ज़हर घोलने से बाज़ नहीं आते, सारे नए पुराने किस्से हमें मालूम है अब हमारी बारी है, और फैसला हमारा होगा कि हमें किस ओर करवट लेनी चाहिए ।
अब एक सन्देश जो देश के हर जन जन तक पहुँचाना चाहता हूँ जो मेरा नहीं बल्कि आम आदमी का आम आदमी के लिए ही है जिसका हनन आज तक होता आया है किन्तु इस बार ऐसा न होने दें |
आम आदमी के इस फैसले से हम देश नहीं बल्कि सोच बदलने जा रहे हैं १ सोच जो जीवन में नयी उमंग और तरंग ला सकती है, क्या इस बार सत्ता में काबिज सरकार हमारी उम्मीदों पर खरा उतरेगी, ये तो निश्चितरूप से समय बतायेगा ।
अब हम पर यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गयी है और इनको सबक सीखने का मौका भी, यदि आम आदमी अपनी शक्ति को प्रदर्शित करना चाहता है और अपना खोया हुवा नाता वापस लाना चाहता है तो इस बार क्या हमारी कोई रणनीति है या इस बार भी हम हर बार की भांति फिर से ठग लिए जायेंगे, देखते हैं, अब तो हम सब को चुनाव तक इंतज़ार और फिर सत्ता में आयी सरकार के सरोकार से ही मालूम पड़ेगा कि इस बार आम आदमी के हाथ क्या लगा है । या फिर से वही पुराना ढर्रा ।
सधन्यवाद !!!!
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