बुधवार, 30 अप्रैल 2014

दुःखद रेलयात्रा

अक्सर रेलगाड़ियों में लूटपाट की घटना आए दिन समाचार पत्रों में मिल ही जाती है । इस बार यह घटना लालकिला एक्सप्रेस में अलीगढ के नजदीक घटित हुई । अहम बात ये कि इस बार का आक्रमण रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में देखने को मिला ।
ये वही रेलगाड़ी है जो मेरे गाँव के स्टेशन पर रूकती है । ये लगभग हर १-२ स्टेशन छोड़कर रूकती है । ये कोई सुपरफास्ट रेलगाड़ी नहीं कि लगातार २-३ घण्टे तक चलती रहे।
रही बात इसमें यात्रा करने वालों कि तो एक थोड़ा जागरूक व्यक्ति इसमें यात्रा करने से कतराता है । और मज़बूरी ही है तो क्या करेगा कोई । किन्तु मेरे लिए इसकी सुविधा ये है कि मुझे दिल्ली जाने के लिए यह मेरे गाँव के स्टेशन से ही मिल जाती है इसलिए किसी नज़दीक के बड़े स्टेशन पर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती ।

अब आता हूँ पिछले दिनों घटित हुई घटना पर, लूटपाट की इन घटनाओं को पढ़ कर देश की परिस्थितियों का एक दुःखद परिदृश्य सामने आता है ।
बात लूटपाट की नहीं बात है हमारे प्रशासन की लापरवाही और देश के मान्यवर नेतागणों की जो केवल चुनावी रंगमंच पर देश की समस्याओं को अपने चुनावी भाषणो और मेनिफेस्टो में जगह देते आ रहे है और यह आस्वश्त कराते फिर रहे हैं कि मानो सत्ता की चाभी हाथ लगी तो सभी मुद्दों को जड़ से उखाड़ फेकेंगे और हमारी सारी समस्याएं छू मंतर करने के बाद ही दम लेंगे । ऐसा आज़ादी के बाद से होता आ रहा है किन्तु कुछ बुनियादी समस्याओं का अवलोकन करें तो असल तस्वीर बहुत धुंधली ही नज़र आती रही है ।
लूटपाट की इन घटनाओं के दोनों पहलूवों को देखने की ज़रूरत है । जिसमे लुट के शिकार देश की गरीब जनता और वो भी गरीब जनता जो इसे अन्जाम देते हैं । 
यदि हम पहले पहलु की बात करें, इस बार यह लूटपाट की घटना देश के उस निम्न तपके के लोगों के साथ घटित हुई जिन्हे अपने क्षेत्र में कोई काम न मिलने के कारण बड़े शहरों का रास्ता देखना पड़ता है । देश की तमाम चलायी गयी राष्ट्रीय योजनाओं का इनसे कोई सरोकार नहीं या ये कहें उनसे इन्हे लाभ नहीं वरन इन्हे अपना घर परिवार छोड़ना पड़ता है । यह इंसान मानो गन्ने की लुगदी समान है जिसको निचोड़ने पर आप समझ सकते हैं क्या निकलेगा । कुछ रस तो उनमें से निकलने वाला नहीं लेकिन इन घटनाओं का जो मानसिक आघात उन लोगों पर होगा उसका अनुमान लगाना और उसके दूरगामी परिणाम हम और आप गणना करने योग्य नहीं है ।
अब आते हैं दूसरे पहलु पर जो लोग इस तरह की घटनाओं को अन्जाम देते हैं, इन लूट्पाटी लोगों की भी स्थिति  देखे तो ये भी लोग गरीबी के ही शिकार जान पड़ते है जो देश की बुनियादी ज़रूरते के न मिलने के कारण अपना रोष अपने ही तपके के लोगों पर उतारने की कोशिश करते हैं । ये भी भली भांति जानते हैं कि हम अपने से ऊँचे के साथ जोर से बोल नहीं सकते तो अपनी हेकड़ी कैसे दिखाएंगे तत्पश्चात ऐसे तुच्छ कृत्य के लिए मज़बूर है । चलो मज़बूरी भी है तो क्या यह रास्ता उन्हें सहज जान पड़ता है ।
यदि सहज जान पड़ता है तो हमारे प्रशासन की ज़िम्मेदारियों पर सवालिया निशान उठाना लाज़मी है । इसके बाद उन राजतन्त्रों पर भी ।

क्या नेतागणों का ध्यान इन छोटे मगर आहात करने वाले मुद्दों पर भी सोचने को मजबूर करता है ? मैं कहता हूँ इस तरह के कई मुद्दे हैं जिन पर ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है । लेकिन बड़ी पार्टियां बस बड़े मुद्दे पकड़ लेने मात्र से सोचते है कि बहुसंख्यक वोट पर हम अपनी पकड़ बना लेने से सत्ता की कुंजी तो हाथ लग ही जाएगी बाकी इतने बड़े देश में ऐसी छोटी मोटी घटनाएँ तो होती ही रहती हैं ।  ऐसा नेतागण सोचते हैं, अभी भले न सोच रहे हों क्योंकि यह उनके परीक्षा की घडी है अमूमन ऐसा ही होता आया है विगत आज़ादी के बाद से । या फिर अपने इस राजनितिक व्यापार के मुनाफे के लिए इन मुद्दों से उनके वोटों में अधिक बढ़ोत्तरी नहीं होने वाली है यह जानकर इस पर सोचने की कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं बनती है ।



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