शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

हुस्न और इश्क

इश्क में रोना गर इश्क ना हो ना |
इश्क में रोना गर हुस्न किसी और का होना |
इश्क में फिर भी रोना गर हुस्न मेरा होना |
यही दस्तूर है इश्क और हुस्न का मेरे हसनैन | |

नज़र नज़र का फेर है, उनकी इक नज़र गर इस तरफ गिर जाये
आम गर ख़ास न बन जाये, खुदा कसम नाम बदल लेंगे हसनैन मियां | |

हुस्न और इश्क के इस बाज़ार में हम न  बिक पायेगे |
और आप के पास इतनी कीमत भी नहीं हसनैन भाई | |

Courtesy: हसनैन |

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