गुज़रे ज़माने कि तस्वीर धुंधली होने नहीं देता
जब भी वक़्त मिला सफर ज़रूर करता हूँ । ।
हर ज़र्रे पे अपनी बसारत पेश करता हूँ
जो मिल जाये उसे सलाम ज़रूर करता हूँ । ।
सफर के इस बसर में बंद-ओ-बस्त क्या करना
जो मिल जाये वही शुक्र-ए-ख़ुदा जरूर करता हूँ । ।
आइना साफ करते करते जब कभी भी थक गया
इक बार अपने अक्स को साफ़ ज़रूर करता हूँ । ।
जब भी वक़्त मिला सफर ज़रूर करता हूँ । ।
हर ज़र्रे पे अपनी बसारत पेश करता हूँ
जो मिल जाये उसे सलाम ज़रूर करता हूँ । ।
सफर के इस बसर में बंद-ओ-बस्त क्या करना
जो मिल जाये वही शुक्र-ए-ख़ुदा जरूर करता हूँ । ।
आइना साफ करते करते जब कभी भी थक गया
इक बार अपने अक्स को साफ़ ज़रूर करता हूँ । ।
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