हर शख्स सड़कों पर गुबार लिए चलता है |
मानो, ज़िंदगी नही झबार लिए चलता है ||
देखता हूँ सड़कों के किनारे तमाम ख़ानाबदोश लोगों को |
वही है जो अपने साथ अपना घर-बार लिए चलता है ||
ना जाने कितनी किस्में हैं इंसानो की ज़माने में |
हसनैन है की हर किसी पे ऐतबार किए चलता है ||
यूँ तो है चलती फिरती खबर की दुकान |
ना जाने फिर भी ये क्यूँ अख़बार लिए चलता है ||
मानो, ज़िंदगी नही झबार लिए चलता है ||
देखता हूँ सड़कों के किनारे तमाम ख़ानाबदोश लोगों को |
वही है जो अपने साथ अपना घर-बार लिए चलता है ||
ना जाने कितनी किस्में हैं इंसानो की ज़माने में |
हसनैन है की हर किसी पे ऐतबार किए चलता है ||
यूँ तो है चलती फिरती खबर की दुकान |
ना जाने फिर भी ये क्यूँ अख़बार लिए चलता है ||
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