बुधवार, 2 अगस्त 2017

बिन कीचड़ कमल कैसा

आज हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहाँ एक सत्ताधारी दल हर कहीं जीत का स्वाद चखना चाहती है |
हार उसे स्वीकार ही नहीं है |

यही कारण है कि किसी भी प्रकार से वह देश के हर राज्य के साथ साथ संसद के दोनों सदनों में अपने या उनके जैसी विचारधारा वालों को देखना चाहती है जो किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए एक ख़तरे की घंटी है |

ऐसा इसलिए भी है कि जो राजनीतिक दल की सोच में ही लोगों के बीच में द्वेष की भावना को बढ़ावा देना और किसी विशेष बहुसंख्यक संप्रदाय को अल्पसंख्यकों के नाम पर डर को संजोने का काम करना हो |

ऐसे में एक ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर हमारी ज़िम्मेदारी अत्यधिक बढ़ जाती है और ऐसी ताकतों को पनपने से रोकने की ज़रूरत स्वत ही बन जाती है यदि हम सचमुच लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं |


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