एक कहावत हमारे समाज में बहोत ही मशहूर है कि
"जाति जो कभी नहीं जाती।
यद्यपि वो तो मौत के बाद भी नहीं जाती "
इस सियासी घमासान में कोई पीछे हटता प्रतीत नहीं हो रहा तो आखिर सबसे प्रबल प्रत्याशी इस मौके को क्यूँ न भुनाए, मै बात कर रहा हूँ मोदी जी की , वो भी इसमें पीछे नहीं हट रहे क्यूंकि सियासी राजनीती में तो उनकी भी अच्छी पकड़ रही है, हर क्षेत्र को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता है उन्हें इस बात कि भी अनुमान है, अतः उत्तरी भारत कि राजनीती में इन्होने अल्पसंख्यकों पे सियासी वर्जिस कि ही है तो क्या बुरा है क्यूंकि उत्तर भारत में आज भी काफी हद तक जाति की संख्या के आधार पर ही टिकट का बंटवारा होता है, उदाहरणतयः यदि कोई क्षेत्र ब्राह्मण बाहुल्य है तो उस क्षेत्र में ब्राह्मण प्रत्याशी ही होगा चाहे वो सपा,बसपा,कांग्रेस या भाजपा से हो। मैं दिल्ली की नहीं अन्य उत्तर भारत कि बात कर रहा हूँ।
यूँ, रही बात मोदी जी कि तो ये चुनौती बड़े ही शिद्दत और कश्मकश से मोदी जी को मिली है जिसे वो गँवाना नहीं चाह्ते हैं। किसी तरह का भी तंत्र जो उनके काम आजाये वो छोड़ने वाले नहीं है क्यूंकि उन्हें पता है कि इससे अच्छा मौका फिर दोबारा मिलने वाला नहीं है इसलिए कोई कसर न रहे उसका पूरा इंतेज़ाम करने में जुटे हुए हैं क्यूंकि ये मौका गया तो मोदी जी के भी अरमान अडवाणी जी कि तरह ही बन कर रह जायेंगे। उन्हें इस बात का भी आभास है कि सारी परिस्थितियां मेरे लिए ही अनुकूल बनी हुयी है कहीं ये मौका यदि अगले पाँच वर्ष के लिए टला तो समझ लीजिये सपना, सपना ही बन कर रह जायेगा, कारण सिर्फ और सिर्फ दो ही है जो मोदी जी को इस बार थोडा साँस लेने पे मज़बूर कर रहा है, पहला तो ये कि कोंग्रेस का उनके सम्मुख छोटा हुवा कद और आम आदमी पार्टी का अन्य राज्यों कि सीमाओ तक न फैलना, किन्तु आने वाले पाँच वर्षो में तस्वीर बहोत हद तक बदलने वाली है।
"जाति जो कभी नहीं जाती।
यद्यपि वो तो मौत के बाद भी नहीं जाती "
इस सियासी घमासान में कोई पीछे हटता प्रतीत नहीं हो रहा तो आखिर सबसे प्रबल प्रत्याशी इस मौके को क्यूँ न भुनाए, मै बात कर रहा हूँ मोदी जी की , वो भी इसमें पीछे नहीं हट रहे क्यूंकि सियासी राजनीती में तो उनकी भी अच्छी पकड़ रही है, हर क्षेत्र को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता है उन्हें इस बात कि भी अनुमान है, अतः उत्तरी भारत कि राजनीती में इन्होने अल्पसंख्यकों पे सियासी वर्जिस कि ही है तो क्या बुरा है क्यूंकि उत्तर भारत में आज भी काफी हद तक जाति की संख्या के आधार पर ही टिकट का बंटवारा होता है, उदाहरणतयः यदि कोई क्षेत्र ब्राह्मण बाहुल्य है तो उस क्षेत्र में ब्राह्मण प्रत्याशी ही होगा चाहे वो सपा,बसपा,कांग्रेस या भाजपा से हो। मैं दिल्ली की नहीं अन्य उत्तर भारत कि बात कर रहा हूँ।
यूँ, रही बात मोदी जी कि तो ये चुनौती बड़े ही शिद्दत और कश्मकश से मोदी जी को मिली है जिसे वो गँवाना नहीं चाह्ते हैं। किसी तरह का भी तंत्र जो उनके काम आजाये वो छोड़ने वाले नहीं है क्यूंकि उन्हें पता है कि इससे अच्छा मौका फिर दोबारा मिलने वाला नहीं है इसलिए कोई कसर न रहे उसका पूरा इंतेज़ाम करने में जुटे हुए हैं क्यूंकि ये मौका गया तो मोदी जी के भी अरमान अडवाणी जी कि तरह ही बन कर रह जायेंगे। उन्हें इस बात का भी आभास है कि सारी परिस्थितियां मेरे लिए ही अनुकूल बनी हुयी है कहीं ये मौका यदि अगले पाँच वर्ष के लिए टला तो समझ लीजिये सपना, सपना ही बन कर रह जायेगा, कारण सिर्फ और सिर्फ दो ही है जो मोदी जी को इस बार थोडा साँस लेने पे मज़बूर कर रहा है, पहला तो ये कि कोंग्रेस का उनके सम्मुख छोटा हुवा कद और आम आदमी पार्टी का अन्य राज्यों कि सीमाओ तक न फैलना, किन्तु आने वाले पाँच वर्षो में तस्वीर बहोत हद तक बदलने वाली है।
mauka to lucky bhai pichle 10 saal se gujarat me janta ne diyaa....mujhe samajh me nahi aata janta is baat se pareshaan hai ki 2002 me danga kyu hua, yaa fir is baat se ki pichle 10 saalo me modi ne dango pe rok kaise lagayi hui hai...
जवाब देंहटाएंSampradaayik chashma hataa ke sochna mere dost. Ye congress hi hai jo logo kaa aaj tak jaati dharam ke naam pe bevkuf banati aayi hai, muslims ko daraati aayi hai... kyu nahi digvijay singh (jo ki MP ka CM tha us time, apne state se police force bheji modi ke baar baar maangne ke baad bhi) ?
Aam aadmi party ko abhi prove kar ke dikhaana hai, desh ko juye me nahi dhakel sakte mere bhai
हटाएंदेखिये वैभव भाई, यु पी में अखिलेश सरकार को भी पूर्ण बहुमत मिला और वो जनता के द्वारा ही प्रदान किया गया इससे तो आप सहमत होंगे किन्तु क्या जिस तरह सरकार यु पी में चल रही है क्या वह बेहतर है मैं तो नहीं समझाता हूँ कि बेहतर है,
किन्तु क्या करें जनता कि मजबूरी है और पार्टियों कि भी ऐसी ब्रांडिंग हो गयी है के कोई इनसे पार नहीं पा रहा है कोई , मै तो अक्सर कहता हूँ कि अखिलेश ने Enviournmental scinece में M. Tech कि हुयी है किन्तु मेरा दोस्त वैभव यदि एक प्रश्न पूछ ले तो उनकी हालत ख़राब हो जायेगी। तो यहाँ आप क्या कहेंगे क्या सही इंसान के हाथ में सत्ता है तो हैम कहेंगे नहीं और किसी इंसान कि काबिलियत होने के बावजूद भी इन लोगों से पर पाना मुश्किल है इसीलिए मै केजरीवाल कि कई बार तारीफ करता हूँ कि वो हममे से ही एक इंसान है जिसने अपनी काबिलियत के बल पर एक अच्छी पहलकदमी कि है जिसे हम सब को आलोचना न करके उनकी इस कदम का स्वागत करना चाहिए इससे वरन केजरीवाल को ही नहीं हम और आप को भी बल मिलेगा।
अब मैं आता हूँ जो आपने लिखा कि "yaa fir is baat se ki pichle 10 saalo me modi ne dango pe rok kaise lagayi hui hai"
हाँ स्वाभाविक है कि दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता है, तो इस चीज़ से वो अपने आपको बचने कि कोशिश करेनेगे स्वाभाविक है और राजनीती आज के समय में १ बिजनेस बन गया है जिस तरह १ बिजनेसमैन किसी प्रोडक्ट को बेचने के लिए उसका जाति या धर्म नहीं पूछता उसे तो बस उसकी कीमत मिलनी चाहिए बस इसी तरह आज राजनीती भी है यदि आपको बने रहना है तो कुछ हो न हो लेकिन कोई ऐसी अनहोनी न हो जिससे आपके बिजनेस पर फर्क पड़े। किन्तु मेरे भाई आप इतना तो समझते हैं न कि किसी राज्य में यदि कुछ भी अनुचित कार्य होता है तो उसमे कहीं न कहीं उस राज्य के मुख्यमंत्री के दायित्तवों पर भी ऊँगली उठना लाज़मी है फिर आप २००२ के दंगों के लिए कुछ न कुछ दायित्व के अधिकार क्षेत्र से में मोदी जी भी आजाते है चाहे वो प्रत्यछ रूप से हो या अप्रत्यछ रूप में हो तो उसकी निंदा तो स्वाभाविक है।
और मै किसी सांप्रदायिक चस्मे से नहीं देख रहा और न ही भयभीत हूँ किसी भी प्रकार के दंगों या और किसी अनहोनी से मौत तो एक दिन आनी है वो किसी भी रूप में हो सकती है उसकी परवाह नहीं।
बस १ बात जो मुझे आज तक पसंद नहीं आती वो है के जब भी मोदी जी से ये बात पूछी जाती है के जो २००२ में दंगे हुए आपके राज्य उसके लिए आप उन परिवारों से माफ़ी नहीं मांगना चाहेंगे आख़िरकार आप उस राज्य के मुख्यमंत्री थे आपका भी दायित्व बनता है कि इस तरह कि घटना न हो। उन्होंने किस तरह बात को घुमाया है और मरे हुए लोग चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लमान उनको कुत्ते के पिल्लै से तुलना करना क्या उचित है , तो उनका जवाब क्या आता कि यदि मै पीछे सीट पे बैठा हूँ और मेरा ड्राईवर गाड़ी चला रहा है यदि कोई कुत्ते का पिल्ला उस गाड़ी के निचे आ जाता है तो स्वाभाविक है के मुझे अफ़सोस होगा। इंसानियत के नाते वैभव मैं आपसे पूछना चाहूंगा कि इस बात से आपको क्या समझ आता है। इससे इंसान कि सोच पता चलता है.बाकि सरकार चाहे केजरीवाल कि हो या मनमोहन कि या मोदी कि हैम लोगों के निजी ज़िन्दगी में बहोत ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला नहीं है. मैं तो बस यह चाहता हूँ कोई भी इस देश में राज करे किन्तु जो सचमुच ज़रूरतमंद हैं उनकी ज़रूरतें पूरी हों।